ISRO की चेतावनी! देश में हाई रिस्क में हैं 130 ग्लेशियर झीलें, आबादी वाले निचले क्षेत्रों में तबाही का खतरा
जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलें तेजी से बढ़ रही हैं। इसरो के अध्ययन से पता चला है कि देश में 130 ऐसी झीलें उच्च जोखि ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
130 ग्लेशियर झीलें उच्च जोखिम पर, फटने का खतरा।
इसरो अध्ययन: 676 झीलों का आकार 27% से अधिक बढ़ा।
जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता खतरा।
जागरण संवाददाता, देहरादून। जलवायु परिवर्तन का सीधा असर उच्च हिमालयी क्षेत्रों पर भी नजर आ रहा है। जिन ग्लेशियर क्षेत्रों में मानव की आवाजाही बेहद सीमित है, वहां भी अब मौसम का मिजाज खतरे की घंटी बजा रहा है।
ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और ग्लेशियर झीलें अपना आकार बढ़ा रही हैं। 130 ऐसी झीलें चिह्नित की गई हैं, जो क्षमता से अधिक आकार बढ़ने की स्थिति में फट सकती है। ऐसे में आबादी वाले निचले क्षेत्रों में तबाही का खतरा भी बढ़ गया है।
ग्लेशियर झीलों के अनियंत्रित ढंग से आकार बढ़ाने की यह हकीकत इसरो के सेटेलाइट अध्ययन में सामने आने के बाद विज्ञानियों की चिंता भी बढ़ गई है। हिंदुकुश क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. पीएस नेगी ने कहा कि इस रिपोर्ट में गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट साफ बताती है कि वर्ष 1984 से 2023 तक किए गए सेटेलाइट अध्ययन के अनुसार 2431 बड़ी झीलें चिह्नित की गई हैं। जिनका आकार 10 हेक्टेयर से अधिक है। इनमें से 676 झीलों के अपना आकार 27 प्रतिशत से अधिक बढ़ाया है।
हाई रिस्क वाली झीलें
सिंधु बेसिन, 65
ब्रह्मपुत्र बेसिन, 58
गंगा बेसिन, 07
ग्लेशियर झीलों से जुड़े अहम तथ्य
- हिमाचल प्रदेश की गेफांग घाट झील का आकार सर्वाधिक 178 प्रतिशत बढ़ा। इसका कुल आकार 101.3 हेक्टेयर पाया गया।
- हिमालयी क्षेत्र में 10 लाख लोग ग्लेशियर झीलों के 10 किमी के दायरे में रहते हैं।
छोटी झीलों को मिलाकर संख्या 8 हजार
खबरें और भी
इसरो ने बड़ी झीलों पर अध्ययन किया है, लेकिन विभिन्न संस्थानों के विज्ञानियों के अध्ययन के अनुसार हिमालय में छोटी-बड़ी सभी तरह की झीलों की संख्या 8 हजार से अधिक है। वहीं, वर्ष 1990 के बाद कम से कम 1000 नई ग्लेशियर झीलें अस्तित्व में आई हैं।
हिंदुकुश क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कार्यों से जुड़े वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. पीएस नेगी के अनुसार गर्मियों में यदि कम बर्फ गिरी तो ग्लेशियर झीलों का आकार बढ़ने के साथ ही इनके फटने का खतरा भी बढ़ गया है। लिहाजा, इनकी निरंतर निगरानी आवश्यक है।