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    दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे: उत्तराखंड में संभावनाओं का नया सवेरा

    Updated: Wed, 15 Apr 2026 10:44 AM (IST)

    दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारा उत्तराखंड के लिए एक गेमचेंजर साबित हो रहा है। यह एक्सप्रेसवे दिल्ली से देहरादून का सफर मात्र ढाई घंटे में तय करेगा, जिस ...और पढ़ें

    HighLights

    1. दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे उत्तराखंड के लिए गेमचेंजर साबित होगा

    2. सफर मात्र ढाई घंटे, औद्योगिक विकास और रोजगार को बढ़ावा

    3. पर्यटन, तीर्थाटन को नव-संजीवनी, पहाड़ों में लौटेगा नवजीवन

    मनोज झा, राज्य संपादक, उत्तराखंड। कुछ योजनाएं विकास की आरंभ यात्रा होती हैं तो कुछ विकास को गति देती हैं, जबकि कुछ प्रगति के पन्नों पर नई इबारत लिखती हैं। नई इबारत लिखने वाली योजनाओं को विकास की आधुनिक शब्दावली में गेमचेंजर भी कहा जाता है।

    संभावनाओं के फलक पर नजर दौड़ाएं तो मंगलवार को शुरू हुआ दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारा आने वाले समय में गेमचेंजर साबित होने जा रहा है। विशेषकर उत्तराखंड की दृष्टि से यह सिर्फ एक एक्सप्रेसवे नहीं, बल्कि अपार संभावनाओं के द्वार खोलने जा रहा है। इस गेमचेंजर गलियारे की सौगात के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह गदगद कंठ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार जताया, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उत्तराखंड संभावनाओं के इस नव-द्वार का मूल्य भलीभांति समझता है।

    पांच साल पहले जब इस एक्सप्रेसवे का शिलान्यास हुआ था, तब ऐसा लगता नहीं था कि दिल्ली से देहरादून के सफर का समय इतना सिमट जाएगा। अभी साल भर पहले तक भी कई लोगों को यह यकीन नहीं हो पा रहा था कि यह सफर महज ढाई घंटे का हो जाएगा। इसलिए उद्घाटन के बाद जब आम लोगों के लिए यह एक्सप्रेसवे चालू हुआ तो कई लोगों ने इस ढाई घंटे की सच्चाई परखने के लिए ही देहरादून या दिल्ली तक अपनी गाड़ियां दौड़ा दीं।

    निश्चित रूप इस महत्वाकांक्षी परियोजना के साकार होने का सबसे बड़ा कारण डबल इंजन सरकार की ताकत रही। पीएम मोदी के संकल्प और मुख्यमंत्री धामी की लगन ने कपोल कल्पना-सी प्रतीत होने वाली इस परियोजना को जमीन पर उतार दिखाया। संभवतः यही कारण था कि मंच पर पीएम मोदी के साथ-साथ सीएम धामी के चेहरे विश्वास से लबरेज दिख रहे थे।
    डबल इंजन की सरकार के चलते ही इस परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक वातावरण मिला। हालांकि, यह पूरी परियोजना केंद्र के पाले में थी और राज्य सरकार के पास इसमें करने के लिए कुछ खास नहीं था।

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    फिर भी उत्तराखंड में धामी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के चलते परियोजना की राह में एक दिन भी किसी प्रकार की बाधा सामने नहीं आई। आए दिन हम देखते हैं कि श्रेय लेने और देने की होड़ में परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाली सरकारों के चलते परियोजनाएं किस तरह अटकती-भटकती हैं। यहां बाबा केदार की कृपा ही कही जाएगी कि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे इन अड़ंगों-अड़चनों से पूरी तरह अछूता बना रहा। साथ ही रिकार्ड समय में यह बनकर तैयार भी हुआ।

    अब जबकि दिल्ली दूर नहीं रह गई है तो यह एक्सप्रेसवे राजधानी देहरादून के साथ-साथ पूरे उत्तराखंड को गति और शक्ति प्रदान करने जा रहा है। अब बारी इस सौगात के माध्यम से उत्तराखंड की संभावनाओं को नया विस्तार देने की है। इसके चलते आने वाले समय में देहरादून के आसपास औद्योगिक संरचना को एक नया विस्तार मिलेगा। दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत से कनेक्टिविटी मजबूत होने से रोजगार के नये सोपान खुलेंगे। इससे तीर्थाटन और पर्यटन उद्योग को नव-संजीवनी भी मिलने जा रही है।

    एक्सप्रेसवे के बाद अब चारधाम बारहमासी रोड और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के पूरा होते ही पहाड़ों का दुर्गम सफर आसान होने जा रहा है। कुल मिलाकर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पटल पर उत्तराखंड एक नई करवट लेने जा रहा है। और तब संभवतः सूने होते जा रहे पहाड़ों में फिर से नवजीवन लौट सकता है।

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