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    न बादल फटा, न झील टूटी… फिर कैसे आई धराली आपदा? वाडिया संस्थान की रिपोर्ट ने किए चौंकाने वाले खुलासे

    Updated: Tue, 12 May 2026 04:01 PM (GMT+05:30)

    उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 को आई विनाशकारी बाढ़ सिर्फ बादल फटना नहीं थी, बल्कि श्रीकंठ पर्वत की विशेष भूआकृति और मानवीय हस्तक्षेप सहित कई प्र ...और पढ़ें

    5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धराली में आई थी विनाशकारी बाढ़।

    5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धराली में आई थी विनाशकारी बाढ़।

    HighLights

    1. धराली बाढ़ 2025 बादल फटना नहीं, बहु-कारणों का परिणाम

    2. श्रीकंठ पर्वत की भूआकृति ने बढ़ाई लगातार बारिश की तीव्रता

    3. मानवीय निर्माणों ने आपदा को किया और भी विनाशकारी

    सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तरकाशी जिले के धराली, हर्षिल और सुक्की क्षेत्र में 05 अगस्त 2025 को आई विनाशकारी बाढ़ एक सामान्य ''क्लाउडबर्स्ट'' या बादल ''फटना'' नहीं थी।

    विज्ञानियों के अनुसार यह कई प्राकृतिक और मानवजनित कारणों के एक साथ सक्रिय होने का परिणाम था। वाडिया संस्थान के विज्ञानियों की ओर से प्रकाशित शोध पत्र में इस पूरी घटना का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

    इसमें मुख्य रूप में श्रीकंठ पर्वत की विशेष भूआकृति के चलते निरंतर वर्षा के प्रमाण मिले हैं, जिसने अस्थिर तीव्र ढलानों को सक्रिय कर दिया था।

    वरिष्ठ विज्ञानी डा. मनीष मेहता के अनुसार 05 अगस्त 2025 को दोपहर लगभग 1:30 बजे उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में स्थित खीर गाड़ में अचानक भीषण बाढ़ और मलबे का सैलाब आया।

    इसके एक घंटे के भीतर ही हर्षिल के पास तेल गाड़ और सुक्की के पास भेला गाड़ में भी अचानक बाढ़ आ गई। ये तीनों नाले अलग-अलग जलग्रहण क्षेत्रों से निकलते हैं, इसलिए इतने कम समय में तीनों में एक साथ बाढ़ आना विज्ञानियों ने बेहद चिंताजनक और असामान्य घटना मानी।

    शोध में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि यह घटना सीधे तौर पर बादल फटने या ग्लेशियर झील फटने के कारण नहीं हुई।

    वरिष्ठ विज्ञानी डा. मेहता के अनुसार भारत मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) के रिकार्ड बताते हैं कि 03 से 05 अगस्त 2025 के बीच उत्तरकाशी में अत्यधिक वर्षा दर्ज नहीं की गई। अधिकांश जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश हुई। हर्षिल में तो मात्र 6.5 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई।

    हालांकि, ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में स्थिति असामान्य रूप से अलग थी। ऊंचाई वाले क्षेत्रों के आंकड़ों के अनुसार 2540 मीटर की ऊंचाई पर तेल कैंप क्षेत्र में आपदा के तीन दिनों में 108 एमएम वर्ष रिकार्ड की गई, जबकि 3763 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर बेस कैंप क्षेत्र में 88.6 एमएम वर्षा पाई गई। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इसी निरंतर वर्षा के दौर ने ढलानों पर जमा अस्थिर मलबे को सक्रिय कर दिया।

    इसके अलावा शोध में बताया गया कि खीर गाड़, तेल गाड़ और भेला गाड़ की घाटियां पुराने ग्लेशियरों से निर्मित हैं। यहां भारी मात्रा में मोरेन (ग्लेशियरों की ओर से छोड़ा गया ढीला मलबा), बर्फ, चट्टानी अवशेष और ढलानों पर अस्थिर सामग्री जमा हैं।

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    इसके अलावा 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर वनस्पति बेहद कम है और लगातार वर्षा ने ढीले मलबे से बने भूभाग का तेजी से क्षरण किया। साथ ही कई स्थानों पर अस्थायी झीलें बन गईं और दबाव बढ़ने पर अवरोध न ध्वस्त हो गए, बल्कि पूरे वेग के साथ निचले क्षेत्रों में तबाही बनकर टूट पड़े।

    श्रीकंठ पर्वत ने इस तरह बढ़ाया आपदा का खतरा

    शोध पत्र के अनुसार मानसूनी नमी से भरे बादल जब दक्षिण दिशा से हिमालय की तरफ बढ़ते हैं तो उन्हें श्रीकंठ जैसी ऊंची और खड़ी पर्वत श्रृंखलाओं से टकराना पड़ता है।

    यहां भी ऐसा ही हुआ। जिस कारण हवाएं और ऊंची उठीं और वहां उन्हें तेजी से कम होते तापमान का सामना करना पड़ा। इससे वर्षा का एक लंबा दौर शुरू हो गया।

    02 लाख वर्गमीटर तक फैला मलबा

    शोध में इसरो और एनआरएससी की सेटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण भी किया गया। जिसके माध्यम से बताया गया कि धराली के उच्च क्षेत्रों से इतना मलबा नीचे आया, जिसने करीब 02 लाख वर्गमीटर भूभाग को पूरी तरह से पाट दिया।

    धराली पहले भी भुगत चुका है ऐसी त्रासदी

    शोध पत्र में एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को भी उठाया गया। बताया गया कि धराली का प्राचीन कल्प केदार मंदिर अब लगभग मलबे में दब चुका है।

    वर्ष 1866 की तस्वीरों में यह मंदिर पूरी तरह खुला दिखाई देता है, जबकि 2023 तक यह आधा दब चुका था। 2025 की बाढ़ के बाद यह लगभग पूरी तरह मलबे में समा गया। इससे विज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला कि यह क्षेत्र सदियों से मलबा और बाढ़ झेलता आया है।

    यहां बार-बार मलबे वाली बाढ़ आती रही है। वर्तमान बसावट प्राकृतिक खतरे वाले इलाके में की गई थी। शोध के अनुसार वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी सबक नहीं लिया गया।

    नदी किनारे होटल और रिसार्ट बनते रहे। आलुवियल फैन (पुराने मलबे से बने मैदान) पर निर्माण हुए। नदी के प्राकृतिक बहाव को रोकने वाली रिटेनिंग वाल बनाई गईं। हर्षिल में सेना का कैंप भी अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में बना था।

    विज्ञानियों ने कहा कि इन निर्माणों ने पानी के प्राकृतिक रास्ते बदले, मलबा जमा होने में मदद की और आपदा की तीव्रता बढ़ा दी।

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