भारत में भी आ सकती है नेपाल जैसी त्रासदी, हिमालय में 221 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की हुई पहचान
हिमालय में 221 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है, जो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ा रही हैं।

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HighLights
हिमालय में 221 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान।
झीलों की संख्या व क्षेत्रफल बढ़ने से GLOF का खतरा।
आबादी, सड़क, जलविद्युत परियोजनाओं पर मंडराया जोखिम।
जागरण संवाददाता, देहरादून। हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ नई ग्लेशियर झीलों का विस्तार भी चिंता बढ़ा रहा है। नेपाल में भोटेकोशी नदी में एआई जलप्रलय के पीछे भी ग्लेशियर आधारित बड़ा खतरा सामने आया है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानी लितान मोहंती और आस्ट्रिया स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाजी के प्रतीक गंतायत के ताजा अध्ययन पर बात करें तो हिमालयी क्षेत्र में कुल 24,440 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। इनमें 221 झीलों को बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील पाया गया है।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग वर्षों में किए गए पांच बड़े हिमनदीय झील अध्ययनों के आंकड़ों को एक साथ रखकर यह आकलन किया। कुल झीलों में करीब 12,100 सुप्राग्लेशियल झीलें हैं, जो ग्लेशियर की सतह पर बनती हैं। अन्य में ग्लेशियर के आगे बनी प्रोग्लेशियल झीलें, अपरदन से बनी झीलें, चट्टानी बांध वाली और घाटी अवरुद्ध झीलें शामिल हैं।

10,101 झीलें 0.01 वर्ग किलोमीटर से बड़ी
अध्ययन में 10,101 झीलों का क्षेत्रफल 0.01 वर्ग किलोमीटर से अधिक पाया गया। अधिकतर झीलें 4,500 से 5,500 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित हैं। अध्ययन के अनुसार समय के साथ झीलों की संख्या और कुल क्षेत्रफल दोनों बढ़ रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों में झीलों के विस्तार की दर 17 से 76 प्रतिशत के बीच पाई गई।
बेसिन स्तर पर झील क्षेत्रफल में सबसे अधिक बदलाव कोसी, यारलुंग जांगबो, मानस, कर्णाली, ऊपरी सिंधु और तीस्ता बेसिन में मिला। शोधकर्ताओं ने इन्हें भविष्य में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) की दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना है। झीलों का विस्तार विशेष रूप से करीब 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक मिला।

कोसी में सर्वाधिक 47 संवेदनशील झीलें
अध्ययन में विभिन्न पूर्व अध्ययनों में चिन्हित संवेदनशील झीलों को मिलाकर 221 महत्वपूर्ण झीलों की पहचान की गई। इनमें सबसे अधिक 47 कोसी बेसिन में हैं। इसके बाद यारलुंग जांगबो और तीस्ता में 22-22, मानस में 21, छिंगहाई-तिब्बती क्षेत्र में 15, पंचनद में 12 और फेलकू में आठ महत्वपूर्ण झीलें मिलीं।
शोधकर्ताओं ने खतरे का आकलन केवल झील के आकार के आधार पर नहीं किया। यह भी देखा गया कि झील फटने की स्थिति में उसके नीचे कितनी आबादी, सड़कें, रेलवे, भवन और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और एएचपी यानी एनालिटिकल हायरार्की प्रोसेस का इस्तेमाल किया गया।

कश्मीर से सिक्किम तक उच्च खतरा
संयुक्त खतरा मानचित्र में भारत के चेनाब और झेलम बेसिन (कश्मीर), चेनाब और ब्यास बेसिन (हिमाचल प्रदेश) तथा तीस्ता बेसिन (सिक्किम) को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया। नेपाल में कोशी, तामाकोशी और दूधकोशी, जबकि भूटान में मानस बेसिन की कुरी चू उप-बेसिन उच्च खतरे वाले क्षेत्रों में शामिल हैं। महत्वपूर्ण झीलों की संख्या, संभावित बाढ़ मात्रा तथा नीचे मौजूद आबादी और बुनियादी ढांचे के मेल से इन क्षेत्रों में जोखिम बढ़ता है।
उत्तराखंड में 1,242 जलविद्युत परियोजनाओं का डेटाबेस
अध्ययन में हिमालय के दक्षिणी हिस्से में जलविद्युत परियोजनाओं का भी डेटाबेस तैयार किया गया। कुल 1,242 जलविद्युत परियोजनाओं की पहचान हुई। इनमें ब्यास में 384, रवि में 183, टौंस में 106, चेनाब में 58, तीस्ता में 55, काली में 40, सतलुज में 39, अलकनंदा में 32, भागीरथी में 31 और झेलम में 28 परियोजनाएं दर्ज की गईं।
उत्तराखंड को अध्ययन में अलग से सर्वाधिक जोखिम वाला राज्य नहीं बताया है, लेकिन आबादी और जलविद्युत ढांचे की मौजूदगी के कारण यहां जीएलओएफ जोखिम का आकलन महत्वपूर्ण है। आबादी घनत्व के लिहाज से नेपाल के बाद हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और भूटान को उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में रखा गया है।
हर तरह के जोखिम का आकलन आवश्यक
अध्ययन के निष्कर्ष के रूप में विज्ञानियों ने कहा कि ग्लेशियर झीलों के बदलते आकार और संख्या के साथ केवल झीलों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। संभावित बाढ़ की दिशा में आने वाली आबादी, सड़क, रेलवे और जलविद्युत परियोजनाओं को साथ रखकर जोखिम का आकलन और निगरानी व्यवस्था विकसित करना जरूरी है।
