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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 16, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    तेंदुए के स्‍वभाव में आया बदलाव, अध्‍ययन में सामने आई ये चौंकाने वाली बात

    By Sunil NegiEdited By:
    Updated: Tue, 16 Jul 2019 08:42 PM (IST)

    तेंदुए के स्वभाव को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है। प्रसिद्ध शिकारी लखपत सिंह रावत के अध्ययन पर गौर करें तो गुलदार (तेंदुए) अब समूह में रहकर शिकार ...और पढ़ें

    तेंदुए के स्‍वभाव में आया बदलाव, अध्‍ययन में सामने आई ये चौंकाने वाली बात
    तेंदुए के स्‍वभाव में आया बदलाव, अध्‍ययन में सामने आई ये चौंकाने वाली बात

    केदार दत्त, देहरादून। वन्यजीवों विशेषकर गुलदारों के खौफ से त्रस्त उत्तराखंड में अब इनके स्वभाव को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है। प्रसिद्ध शिकारी लखपत सिंह रावत के अध्ययन पर गौर करें तो गुलदार (तेंदुए) अब समूह में रहकर शिकार भी करने लगे हैं। अल्मोड़ा के बाद बागेश्वर में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। इस बदलाव को अस्तित्व की लड़ाई में खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की गुलदारों की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। 

    अमूमन, नर गुलदार अकेला रहता है और अकेले ही शिकार करता है। अलबत्ता, मादा गुलदार अपने बच्चों को ढाई-तीन साल तक अपने साथ रखती है और इसी दौरान उन्हें शिकार के तरीके सिखाती है। यह अवधारणा अब दम तोड़ती नजर आती है। प्रसिद्ध शिकारी लखपत सिंह रावत का अध्ययन तो यही कहता है। प्रदेश में वर्ष 2002 अब तक विभिन्न क्षेत्रों में 53 आदमखोर गुलदारों को ढेर कर जनसामान्य को इनके खौफ से मुक्ति दिलाने वाले लखपत ने इस अवधि में इनके स्वभाव को लेकर भी अध्ययन किया। 

    गैरसैंण (चमोली) में प्रभारी उप शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत लखपत सिंह बताते कि गुजरे 17 वर्षों में गुलदारों के स्वभाव में भारी परिवर्तन देखने को मिला है। वह बताते हैं कि सरवाइव करने के लिए गुलदार अब समूह में रहकर शिकार करने लगे हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर में बागेश्वर में समूह में रह रहे चार गुलदारों की सक्रियता ने सांसें अटका दी थीं। ये समूह में रहकर शिकार कर रहे थे। इसकी तस्वीरें वहां सीसीटीवी कैमरों में कैद हुई थीं। इनमें से तीन गुलदारों को मार गिराया गया था, जबकि एक को पकड़ा गया। 

    शिकारी लखपत सिंह के अनुसार बागेश्वर से पहले वर्ष 2016 में अल्मोड़ा के लमगड़ा में भी ऐसी ही स्थिति थी। वहां समूह में रह रहे गुलदारों में से एक को मारा गया और एक को पकड़ा गया, जबकि दो को अलग-अलग क्षेत्रों में खदेड़ा गया था। गुलदारों के स्वभाव में यह परिवर्तन इस बात का द्योतक है कि गुलदार अब परिस्थितियों के अनुरूप खुद को बदल रहे हैं। वह कहते हैं कि इस सबको देखते हुए गहन अध्ययन कर ठोस एवं प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। लखपत के मुताबिक वह इस संबंध में वन विभाग के अफसरों को भी अवगत करा चुके हैं। 

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    हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों की राय इससे जुदा है। मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव आरके मिश्र कहते हैं कि गुलदारों का समूह में रहकर शिकार करना असंभव सी बात है। वह बताते हैं कि ब्रीडिंग सीजन के दौरान तो नर-मादा साथ दिखते हैं, मगर इसके बाद नर अकेले ही रहता है। यही नहीं, मादा बच्चों को पालती है और ढाई- तीन साल तक उन्हें साथ रहकर शिकार करना सिखाती है। हो सकता है कि बागेश्वर व अल्मोड़ा में ऐसी स्थिति रही होगी। अगर, वास्तव में गुलदार समूह में रह रहे हैं तो इसे लेकर गहन अध्ययन की जरूरत है। 

    गुलदारों ने उड़ाई है नींद 

    71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में मानव और गुलदारों के बीच संघर्ष चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है। राज्य में वन्यजीवों के हमलों में 80 फीसद घटनाएं गुलदारों की हैं। गुलदारों के सबसे साफ्ट टारगेट बच्चे बन रहे हैं और हर साल औसतन वह 24 बच्चों को निवाला बना रहे हैं। 

    इसलिए कर रहे आबादी की ओर रुख 

    • गुलदारों की संख्या में बढ़ोतरी 
    • जंगलों के कटान से वासस्थल में कमी 
    • वनों में भोजन का अभाव 
    • पलायन के चलते खाली खेतों में उगी झाडिय़ां बन रही बसेरा 
    • गांवों के नजदीक मिल रहा आसान भोजन 

    अपनाने होंगे बचाव के तरीके 

    शिकारी लखपत सिंह कहते हैं कि गुलदारों को नरभक्षी घोषित कर मार गिराना समस्या का हल नहीं है। इससे निबटने के लिए हमें बचाव के तरीके अपनाने होंगे। वह कहते हैं कि गुलदारों के हमले की घटनाएं अमूमन शाम छह से आठ बजे के बीच होती हैं। इस दौरान ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। खेतों में कार्य करते वक्त एक व्यक्ति चारों तरफ निगरानी में रहे। वह बताते हैं कि यदि गुलदार पर नजर है तो वह हमला नहीं करता। इससे बचाव के मद्देनजर गुलदार को भ्रमित करने के लिए सिर पर पीछे मनुष्य के चेहरे का मुखौटा लगाया जा सकता है। यही नहीं, गांवों के रास्तों से लगे किनारे के घरों के चारों तरफ कम से कम 20 मीटर तक स्थान खुला रखना होगा। 

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