उत्तराखंड में टाइप-1 डायबिटीज से जूझ रहे 4000 बच्चे, 13 जिलों में पहुंचा गुब्बारा क्लीनिक
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐसे बच्चों को आजीवन मुफ्त इंसुलिन उपलब्ध कराने की पहल का उल्लेख किया और समय पर पहचान को महत्वपूर्ण बताया।
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सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
उत्तराखंड में 4000 से अधिक बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित
गुब्बारा क्लीनिक सभी 13 जिलों में पहुंचा, मुफ्त जांच व परामर्श
केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने आजीवन मुफ्त इंसुलिन का समर्थन किया
राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चियों के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाकर बीमारी से जूझ रहे बच्चों के प्रति संवेदनशीलता व जिम्मेदारी का संदेश दिया। टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बेटियों के साथ रक्षाबंधन मनाते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों को जीवनभर इंसुलिन की जरूरत होती है । उन्होंने ऐसे बच्चों को आजीवन निश्शुल्क इंसुलिन उपलब्ध कराने की पहल का उल्लेख किया।
उत्तराखंंड में चार हजार से अधिक बच्चे जूझ रहे
गृहमंत्री अमित शाह का यह संदेश उत्तराखंड के लिए भी अहम है। प्रदेश में चार हजार से अधिक बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम की स्क्रीनिंग रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 40 हजार से अधिक बच्चे डायबिटीज से प्रभावित हैं, जिनमें चार हजार से ज्यादा टाइप-1 डायबिटीज के मरीज हैं। बच्चों में बढ़ते मामलों को देखते हुए उत्तराखंड में टाइप-1 डायबिटीज के उपचार और निगरानी के लिए शुरू की गई है।
13 जिलों में पहुंचा गुब्बारा क्लीनिक
गुब्बारा क्लीनिक की व्यवस्था अब सभी 13 जिलों तक पहुंच गई है। इन क्लीनिकों के माध्यम से बच्चों की जांच, ब्लड शुगर मानिटरिंग, परामर्श और नियमित फालोअप की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। देहरादून जिला अस्पताल में शुरू किए गए गुब्बारा क्लीनिक में भी बच्चों को मुफ्त जांच और नियमित निगरानी की सुविधा दी जा रही है।
मरीजों का केंद्रीकृत डाटा तैयार करने की कवायद
अब चुनौती प्रदेश में टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों की जिला-वार संख्या को एकीकृत कर केंद्रीकृत डाटा तैयार करने की है। इससे स्वास्थ्य विभाग के पास यह जानकारी हो सकेगी कि किस जिले में कितने बच्चे बीमारी से प्रभावित हैं, कितनों को नियमित इंसुलिन की जरूरत है और कितने बच्चे लगातार फालोअप में हैं। इसके आधार पर इंसुलिन, ग्लूकोमीटर और टेस्ट स्ट्रिप्स जैसी सुविधाओं की जरूरत का भी बेहतर आकलन किया जा सकेगा।
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समय से पहचान करना बड़ी चुनौती
पहाड़ी क्षेत्रों में बीमारी की समय पर पहचान भी बड़ी चुनौती है। बार-बार प्यास लगना, तेजी से वजन घटना, अत्यधिक थकान और बार-बार पेशाब आने जैसे लक्षणों को कई बार सामान्य कमजोरी समझ लिया जाता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइन में इन्हीं शुरुआती संकेतों को 4टी मॉडल के तहत पहचानने पर जोर दिया गया है। इसमें टॉयलेट, थर्स्ट, टायर्डनेस और थिननेस शामिल हैं।
