महाराष्ट्र के पालघर में दो साल तक धरती को कंपा रहे थे 50 हजार झुंड भूकंप, सामने आया असल कारण
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन ने पालघर में 2019-20 के झुंड भूकंपों का कारण बताया है।

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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सुमन सेमवाल, देहरादून। महाराष्ट्र के पालघर में वर्ष 2019-20 के दौरान लगातार आए हजारों छोटे भूकंपों ने वैज्ञानिकों को भूकंप झुंड (अर्थक्वेक स्वार्म) को समझने की नई दिशा दी है।
वरिष्ठ भूविज्ञानी डा विनीत के गहलौत समेत अन्य शोधकर्ताओं के अध्ययन में सामने आया कि पालघर की भूकंपीय गतिविधि को केवल भूमिगत द्रव यानी पानी के दबाव से नहीं समझाया जा सकता। भ्रंशों के बीच तनाव हस्तांतरण और बिना बड़े भूकंप के होने वाली धीमी भ्रंशीय हलचल भी इसमें भूमिका निभा रही थी।
अध्ययन में बताया गया है कि भूकंप झुंड में कोई एक स्पष्ट मुख्य भूकंप नहीं होता। सीमित क्षेत्र में घंटों से महीनों या वर्षों तक कई छोटी घटनाएं हो सकती हैं और गतिविधि का केंद्र बदल सकता है।
पुरानी समझ से आगे बढ़ा अध्ययन
पुरानी वैज्ञानिक अवधारणा में ऐसे झुंडों के पीछे भूमिगत द्रव की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती थी। चट्टानों की दरारों में पानी या अन्य प्राकृतिक द्रव का दबाव बढ़ने पर भ्रंश पर घर्षण घट सकता है और वह खिसककर भूकंप पैदा कर सकता है।
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नए अध्ययन में मशीन लर्निंग से पालघर की करीब 50 हजार भूकंपीय घटनाओं की पहचान की गई। गतिविधि दो लगभग समानांतर उथले सामान्य भ्रंशों पर हुई। पहले पश्चिमी, फिर पूर्वी भ्रंश और बाद में दोनों के बीच के टूटे चट्टानी क्षेत्र में गतिविधि फैली।
यह करीब आठ किलोमीटर गहराई तक पहुंची, जबकि करीब पांच किलोमीटर पर लगातार सक्रिय पट्टी मिली।
कुछ चरणों में गतिविधि भूमिगत द्रव के प्रसार से अपेक्षित गति से तेज थी। इससे संकेत मिला कि द्रव दबाव, धीमी भ्रंशीय हलचल और तनाव हस्तांतरण साथ काम कर रहे थे। दैनिक वर्षा के विश्लेषण में सर्वाधिक भूकंपीय गतिविधि और मौसमी वर्षा के बीच स्पष्ट सीधा संबंध भी नहीं मिला।
झुंड भूकंप बड़े भूकंप की चेतावनी नहीं
भूकंप झुंड को पहले बड़े भूकंप का संभावित पूर्वसंकेत माना गया। गढ़वाल भूकंप के 2011 के अध्ययन में 1995 के उत्तरकाशी के दो झुंड, 2003 में भटवाड़ी के करीब 1,500 भूकंप तथा 2009 के तपोवन और गोपेश्वर झुंड का इसी दृष्टि से अध्ययन हुआ था। 2009 के दोनों झुंडों के बीच करीब 50 किलोमीटर दूरी थी।
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हालांकि, झुंड को अब बड़े भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी का आधार नहीं माना गया। पालघर अध्ययन नई दिशा देता है कि गढ़वाल में भी झुंडों को केवल पूर्वसंकेत नहीं, बल्कि द्रव, भ्रंश और बदलते तनाव की संयुक्त भूगर्भीय प्रक्रिया के रूप में समझा जाए।
