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    उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान, बड़े खतरे की आहट

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 03:30 PM (IST)

    उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो भविष्य में हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान टूटने का बड़ा कारण बन सकते हैं। ...और पढ़ें

    हिमखंड टूटे तो 50 मीटर ऊंचाई तक भरेगा मलबा।

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    सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में मौजूद सैकड़ों ऐसे ग्लेशियर, जो खड़ी चट्टानों से लटके हुए हैं (हैंगिंग ग्लेशियर), भविष्य में हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान टूटने की बड़ी घटनाओं का कारण बन सकते हैं। पहली बार न सिर्फ हैंगिंग ग्लेशियर की पूरी तस्वीर सामने आई है, बल्कि इनकी स्थिति को लेकर चेतावनी भी जारी की गई है।

    विज्ञनियों के समूह ने विस्तृत अध्ययन करते हुए अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग (लटकते) ग्लेशियर चिह्नित किए हैं। अध्ययन के अनुसार इनमें से कई ग्लेशियरों के नीचे बदरीनाथ, माणा, जोशीमठ, तपोवन, हेमकुंड साहिब, प्रमुख सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं स्थित हैं, इसलिए इनकी लगातार निगरानी जरूरी है। यह अध्ययन नेचुरल हजार्ड में प्रकाशित किया गया है।

    अध्ययन में भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी), बेंगलुरु के सेंटर फार अर्थ साइंसेज (नंदू कृष्णन और डा अनिल वी कुलकर्णी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) भुवनेश्वर (डा आशिम सत्तार तथा डीआरडीओ के डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट चंडीगढ़ ( डा हरेंद्र सिंह नेगी) ने संयुक्त रूप से किया।

    शोधकर्ताओं ने सेंटिनल-2 उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन माडल और ग्लैबटाप-2 माडल की मदद से पूरे अलकनंदा बेसिन का विश्लेषण किया। जिसमें पाए गए 219 हैंगिंग ग्लेशियर का कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किमी पाया गया।

    वहीं, कुल अनुमानित बर्फ आयतन 2.39 घन किमी से अधिक मिला। इनमें से भी 0.74 घन किमी बर्फ सबसे अस्थिर (हैंगिंग मास) के रूप में चिन्हित की गई। ये ग्लेशियर औसतन 33 डिग्री ढलान पर स्थित हैं और लगभग 4,018 से 6,759 मीटर की ऊंचाई के बीच पाए गए।

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    यहां मिला सर्वाधिक खतरा

    अध्ययन में पाया गया कि ऊपरी अलकनंदा बेसिन में कुल अस्थिर बर्फ का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। बदरीनाथ-माणा क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील पाया गया। कंप्यूटर आधारित माडल से किए गए सिमुलेशन में अनुमान लगाया गया कि यदि बड़े हिमखंड टूटते हैं, तो कुछ स्थानों पर बर्फ और मलबे की धारा की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक हो सकती है। इससे नीचे स्थित सड़क, पुल, तीर्थस्थल और अन्य ढांचों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

    हर ग्लेशियर समान खतरा नहीं

    विज्ञनियों ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 55 प्रतिशत हैंगिंग ग्लेशियर बड़े मुख्य ग्लेशियरों के ऊपर लटके हैं। यदि इनका कुछ हिस्सा टूटता भी है, तो वह पहले मुख्य ग्लेशियर पर गिरता है, इसलिए उनसे सीधे आबादी को अपेक्षाकृत कम खतरा है। लेकिन जो ग्लेशियर सीधे घाटियों या मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के ऊपर हैं, उनकी अलग से निगरानी की जरूरत है।

    अनियोजित निर्माण बढ़ाएगा जोखिम

    अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि खतरा केवल ग्लेशियरों से नहीं, बल्कि उनके नीचे बढ़ती मानव गतिविधियों से भी बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2000 में संभावित जोखिम क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 8,000 वर्ग मीटर था, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 1.52 लाख वर्ग मीटर हो सकता है। इसी अवधि में संभावित रूप से प्रभावित आबादी करीब 380 से बढ़कर 8,500 तक पहुंचने का अनुमान है। इसका मतलब है कि यदि भविष्य में कोई बड़ी बर्फ-टूटने की घटना होती है, तो उसका प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक लोगों पर पड़ सकता है।

    2021 की चमोली आपदा दे चुकी चेतावनी

    विज्ञनियों ने कहा कि वर्ष 2021 की चमोली आपदा जैसी घटनाओं ने दिखाया है कि हिमालय में बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने से भारी तबाही हो सकती है। उस आपदा में 206 व्यक्तियों ने जान गंवाई थी और विभिन्न परियोजनाओं/संरचनाओं को गंभीर क्षति पहुंची थी।

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