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    24 बरस की उम्र... देशभक्ति का जुनून, देहरादून के केसरी चंद ने आज ही के दिन चूमा था फांसी का फंदा

    Updated: Sun, 03 May 2026 04:08 PM (IST)

    देहरादून के जौनसार-बावर के वीर सपूत केसरी चंद ने 3 मई 1945 को 24 वर्ष की आयु में देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा था। ...और पढ़ें

    जौनसार बाबर के अमर शहीद केसरी चंद।

    जौनसार बाबर के अमर शहीद केसरी चंद।

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    राहुल चौहान, चकराता (देहरादून)। मातृभूमि की आजादी के लिए आज ही के दिन वर्ष 1945 हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले देहरादून जनपद के जौनसार-बावर के वीर सपूत केसरी चंद का नाम आज भी क्षेत्र में गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। महज 24 वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले केसरी चंद की शहादत आज भी देशभक्ति, साहस और त्याग की मिसाल बनी हुई है।

    वीर केसरी चंद का जन्म एक नवंबर 1920 को देहरादून जिले के चकराता तहसील के क्यावा गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित शिव दत्त थे। पहाड़ी परिवेश में पले-बढ़े केसरी चंद की प्रारंभिक शिक्षा चकराता में हुई, जबकि आगे की पढ़ाई उन्होंने देहरादून में की। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना गहरी थी, जिसका प्रभाव उनके पारिवारिक संस्कारों में भी दिखता था।

    देश सेवा के जज्बे के चलते उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और 10 अप्रैल 1941 को रायल इंडियन आर्मी सर्विस कोर में नायब सूबेदार के पद पर भर्ती हो गए।

    इसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर आजाद हिंद फौज का गठन हुआ। देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के संकल्प के साथ केसरी चंद वर्ष 1944 में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई।

    28 जून 1944 को युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया। गिरफ्तारी के बाद उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। तमाम यातनाओं के बावजूद वह अपने इरादों पर अडिग रहे। आखिरकार तीन मई 1945 को उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

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    शहादत से पहले पिता से आखिरी मुलाकात में उन्होंने कहा था, “मैं देश के लिए शहीद हो रहा हूं, इसलिए आपकी आंखों में आंसू नहीं होने चाहिए।” उनकी अंतिम इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनका कफन सूती हो।

    वीर केसरी चंद की शहादत ने जौनसार-बावर और चकराता क्षेत्र में देशभक्ति की नई चेतना जगाई। आज भी उनका बलिदान युवाओं के लिए प्रेरणा और राष्ट्रभक्ति का अमिट प्रतीक बना हुआ है।

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