Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    IIT रुड़की के शोधकर्ताओं ने बनाई अम्ल-प्रतिरोधी तकनीक, दूषित पानी से निकलेगा यूरेनियम और दुर्लभ धातु

    By Rena Edited By: Sachin Sharma
    Updated: Sat, 01 Aug 2026 06:00 AM (IST)

    आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोजिट विकसित किया है जो प्रदूषित जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाकर उन्हें पुनर्प्र ...और पढ़ें

    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की की प्रयोगशाला में शोध कार्य करते शोधार्थी

    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की की प्रयोगशाला में शोध कार्य करते शोधार्थी

    HighLights

    1. आईआईटी रुड़की ने अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोजिट विकसित किया।

    2. प्रदूषित जल से यूरेनियम, दुर्लभ तत्व हटाएगा और पुनर्प्राप्त करेगा।

    3. अपशिष्ट बायोचार का उपयोग कर पर्यावरण-अनुकूल समाधान।

    जागरण संवाददाता, रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोजिट विकसित किया है, जो प्रदूषित जल से यूरेनियम एवं दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाने में सक्षम है। यह नैनोकम्पोजिट इन प्रदूषकों की मूल्यवान संसाधनों के रूप में पुनर्प्राप्ति भी संभव बनाता है। वहीं यह प्रौद्योगिकी दोहरा लाभ प्रदान करती है।

    पहला प्रदूषित जल का शोधन और दूसरा विभिन्न महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक मूल्यवान तत्वों की पुनर्प्राप्ति।
    परियोजना का नेतृत्व कर रहे आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर नितिन खंडेलवाल ने बताया कि अम्लीय अपशिष्ट जल में अधिकतर उन्नत नैनोमैटेरियल प्रभावी नहीं रह पाते। उनकी टीम ने सक्रिय नैनोकणों के चारों ओर अम्ल-प्रतिरोधी छिद्रयुक्त सिलिका की परत विकसित की है। जिससे यह सामग्री कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन करती है।

    उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ कि यह सामग्री प्रति किलोग्राम नैनोमैटेरियल से 370 ग्राम तक यूरेनियम एवं दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाने और उनकी पुनर्प्राप्ति करने में सक्षम है। जो इसकी उत्कृष्ट निष्कर्षण क्षमता को दर्शाता है। यह सामग्री प्राकृतिक भूजल जैसी परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से कार्य करती है। इसके अलावा अत्यधिक अम्लीय जल में भी स्थिर बनी रहती है।

    जहां पारंपरिक सामग्री सामान्यतः अपनी कार्यक्षमता खो देती है। उन्होंने बताया कि इस सामग्री की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसका परिस्थिति-अनुकूल व्यवहार है। लगभग तटस्थ परिस्थितियों में यह एक साथ यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों दोनों को अवशोषित कर सकती है।

    खबरें और भी

    वहीं, अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियों में यह विशेष रूप से यूरेनियम के प्रति चयनात्मक हो जाती है। जिससे जटिल जल मिश्रणों से रेडियोधर्मी यूरेनियम को लक्षित रूप से हटाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बार-बार किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में इस सामग्री ने लगातार पांच चक्रों तक यूरेनियम हटाने की लगभग पूर्ण क्षमता बनाए रखी।

    परियोजना पर कार्यरत शोधार्थी भाव्या स्वामी ने बताया कि उन्होंने इस सामग्री में अपशिष्ट सीवेज स्लज से प्राप्त बायोचार का भी समावेश किया है। जिससे अन्यथा अनुपयोगी माने जाने वाले अपशिष्ट का उत्पादक उपयोग संभव हुआ है। उनके अनुसार अपशिष्ट के मूल्य संवर्धन, प्रदूषक निष्कासन तथा मूल्यवान संसाधनों की पुनर्प्राप्ति का यह संयोजन इस प्रौद्योगिकी को सतत विकास और परिपत्र अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से आकर्षक बनाता है।

    अभी प्रयोगशाला स्तर पर अध्ययन

    वर्तमान अध्ययन का प्रदर्शन प्रयोगशाला स्तर पर किया गया है। अगले चरण में वास्तविक खनन अपशिष्ट जल तथा परमाणु अपशिष्ट जल में सतत प्रवाह परिस्थितियों के अंतर्गत इस प्रौद्योगिकी का परीक्षण करना होगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह नवाचार भविष्य में जल शोधन, रणनीतिक धातुओं की पुनर्प्राप्ति तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

    यह भी पढ़ें- IIT रुड़की समेत 5 इंस्टीट्यूट सवारेंगे युवाओं का भविष्य, यूपी कौशल विकास मिशन ने बनाया नॉलेज पार्टनर