हिमालय में मौसम के खतरों का सटीक पूर्वानुमान: NIH के विज्ञानियों ने सुपर कंप्यूटर से तैयार किया जलवायु मॉडल
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआइएच) रुड़की के विज्ञानियों ने पश्चिमी हिमालय के लिए 9 किलोमीटर रिजाल्यूशन वाला अत्याधुनिक जलवायु माडल विकसित किया है। ...और पढ़ें

राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (एनआइएच) रुड़की परिसर। वहीं, माडल के परीक्षण के लिए चुना गया पश्चिमी हिमालय क्षेत्र। साभार-संस्थान
HighLights
एनआइएच रुड़की ने 9 किमी जलवायु माडल बनाया।
पश्चिमी हिमालय में मौसम, बादल फटने का सटीक अनुमान।
जल संसाधन, आपदा प्रबंधन में सहायक होगा यह शोध।
रीना डंडरियाल, रुड़की। हिमालय की दुर्गम चोटियों पर मौसम कब करवट लेगा, कहां बादल फटने की सबसे ज्यादा आशंका है और आने वाले 10-20 वर्ष में जलवायु क्या करवट लेगी, इन सवालों के सटीक जवाब अब आसानी से मिलेंगे।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआइएच) रुड़की के हिममंडल एवं जलवायु परिवर्तन अध्ययन केंद्र के विज्ञानियों ने सुपर कंप्यूटर की मदद से पश्चिमी हिमालय का नौ किलोमीटर रिजाल्यूशन वाला एक अत्याधुनिक जलवायु माडल तैयार किया है। इससे पता चलेगा कि मौसम का खतरा और बदलाव किस ऊंचाई पर और कहां केंद्रित है।
एनआइएच के विज्ञानी डा. कुलदीप शर्मा के नेतृत्व में हुए नए शोध में विज्ञानियों ने वर्ष 1979 से 2014 तक, यानी पूरे 36 वर्षों के मौसम को सुपर कंप्यूटर (परम पोरुल) के जरिये दोबारा चलाकर देखा है।
इसके तहत मानसून की वर्षा का दक्षिण से उत्तर की ओर घटता पैटर्न, सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली बर्फबारी और ऊंचाई के साथ बदलते तापमान का करीब से अध्ययन किया गया।
इसका डेटा कई पहाड़ी इलाकों में यूरोप के मशहूर ईआरए5 लैंड डेटा से भी बेहतर साबित हुआ है। इस नए माडल के दायरे में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।
शोध टीम में डा. दीपक सिंह बिष्ट, डा. विशाल सिंह, डा. अश्विनी रानाडे, डा. सुरजीत सिंह, साहिदुल इस्लाम व मोहम्मद साजिद भी शामिल हैं।
इसलिए उपयोगी होगा शोध
विज्ञानी डा. कुलदीप शर्मा ने बताया कि हिमालय में जलवायु हर कुछ किलोमीटर की दूरी पर बदल जाती है, लेकिन पुराने जलवायु माडल इस विविधता को नहीं पकड़ पाते।
उनका कहना है कि यह अध्ययन जल संसाधनों की बेहतर योजना बनाने और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
अभी तक दुनिया भर के जलवायु माडल (ग्लोबल क्लाइमेट माडल) 50 से 100 किलोमीटर की अनुमानित दूरी से धरती के मौसम का आकलन कर रहे हैं।
इतनी अधिक दूरी के कारण हिमालय की ऊंची-नीची चोटियां, घाटियां और ढलानें धुंधली होकर लगभग समतल दिखने लगती हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि पहाड़ों पर वर्षा और तापमान के अनुमान अक्सर हकीकत से दूर रह जाते हैं।
शोध का महत्व
- बादल फटने की आशंका वाली ऊंचाई की पहचान होने से सड़क, पुल व बस्तियों के निर्माण की बेहतर योजना बन सकेगी।
- बदलती बर्फबारी और वर्षा का सेब, धान व अन्य पर्वतीय खेती पर होने वाला असर समझने में मदद मिलेगी।
- चारधाम जैसे यात्रा मार्गों पर मौसम के जोखिम का पहले से बेहतर आकलन किया जा सकेगा और नदियों की स्थिति भी पता चलेगी।
कैसी होगी वर्ष 2100 तक की तस्वीर
वैज्ञानिकों की टीम अब वर्ष 2100 तक के जलवायु का अनुमान तैयार कर रही है। इसे दो स्थितियों में परखा जा रहा है, एक मध्यम प्रदूषण उत्सर्जन की स्थिति में और दूसरा उच्च उत्सर्जन की स्थिति में।
इससे पता चलेगा कि आने वाले दशकों में हिमालय में वर्षा, बर्फबारी और तापमान कैसे बदलेंगे और इसका सीधा असर पेयजल, सिंचाई, बिजली परियोजनाओं, सेब की बागवानी और पर्यटन पर क्या पड़ेगा।
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