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    नैनीताल हाई कोर्ट का फैसला: पिता नहीं बच सकते बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से, 8000₹/माह देने का निर्देश

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 12:25 PM (GMT+05:30)

    नैनीताल हाई कोर्ट ने रुड़की परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता को बच्चे के लिए 8,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया। ...और पढ़ें

    नैनीताल हाई कोर्ट।

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    जागरण संवाददाता, नैनीताल। हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।

    मां पर कर्ज के बहाने भरण पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता पिता

    न्यायाधीश न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने रुड़की परिवार न्यायालय के आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। 

    मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें बच्चे की मां ने भरण-पोषण की मांग की थी। परिवार न्यायालय ने आवेदन स्वीकार करते हुए पिता को आवेदन की तारीख से ही 8,000 रुपये मासिक देने का आदेश दिया था।

    हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी, बच्चे को आठ हजार प्रतिमाह देने के आदेश

    इस आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। उसका तर्क था कि वह और उसकी पत्नी दोनों सरकारी सेवा में है। वह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में और पत्नी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत है ,इसलिए पूरा बोझ उसी पर डालना उचित नहीं है। उसने यह भी कहा कि उसकी आय से ऋण की किश्तें, माता-पिता और भाई-बहनों की जिम्मेदारियों पर खर्च होता है।

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    परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराया

    दूसरी ओर बच्चे की ओर से कहा गया कि पिता स्थायी सरकारी कर्मचारी है और उसकी आय स्थिर है, इसलिए उसका वैधानिक दायित्व बनता है कि वह बच्चे का भरण-पोषण करे। निर्धारित राशि भी बच्चे की जरूरतों के हिसाब से उचित है। कोर्ट ने पाया कि बच्चे के पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, इसलिए धारा 125 के तहत पिता का दायित्व स्पष्ट रूप से स्थापित है।

    पिता की पुनरीक्षण याचिका खारिज

    मां की आय के मामले पर कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि मां की आय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल इस आधार पर पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रविधान है, जिसका उद्देश्य अभाव और दरिद्रता को रोकना है, इसलिए इसकी व्याख्या आश्रितों के हित में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए। नाबालिग बच्चे को माता-पिता की स्थिति के अनुरूप जीवन स्तर मिलना चाहिए।

    माता-पिता या अन्य स्वजनों की जिम्मेदारियां भी इस वैधानिक कर्तव्य को समाप्त नहीं करतीं

    हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्ज की किश्तें या अन्य निजी खर्च स्वेच्छिक दायित्व हैं और बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते। माता-पिता या अन्य स्वजनों की जिम्मेदारियां भी इस वैधानिक कर्तव्य को समाप्त नहीं करतीं। तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि 8,000 रुपये मासिक की राशि न तो अधिक है और न ही अनुचित। साथ ही आवेदन की तारीख से भरण-पोषण देने का आदेश भी सही ठहराया गया।

    कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या असंगति नहीं है, इसलिए पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम भरण-पोषण है और अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।

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