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    उत्तराखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला: 'पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार पत्नी को जीवन का आनंद लेने का अधिकार'

    Updated: Tue, 07 Jul 2026 04:41 PM (IST)

    उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण मामले में अहम फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया कि पत्नी को पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार गरिमापूर्ण जीवन जीने क ...और पढ़ें

    उत्तराखंड हाई कोर्ट।

    उत्तराखंड हाई कोर्ट।

    HighLights

    1. पत्नी को पति की आर्थिक क्षमता अनुसार गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार

    2. पति पर पत्नी को आर्थिक सहारा देने का विधिक दायित्व

    3. हाई कोर्ट ने 10 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण को सही ठहराया

    जागरण संवाददाता, नैनीताल। हाई कोर्ट ने पति की ओर से अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका निरस्त करते हुए टिप्पणी की कि पत्नी को गरिमा के साथ जीने और अपने पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार जीवन का आनंद लेने का अधिकार है। पत्नी को आर्थिक रूप से सहारा देने का विधिक दायित्व पति पर है।

    मामला हल्द्वानी निवासी भारतीय सेना के एक सिपाही से संबंधित है। जवान की ओर से परिवार न्यायालय हल्द्वानी के आदेश को आर्थिक आधार पर चुनौती दी गई थी।

    जिसमें अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। परिवार न्यायालय ने अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर प्रति माह 10 हजार रुपये देने का आदेश दिया था।

    याचिकाकर्ता के अनुसार वह हाई-रिस्क वाले क्षेत्र में तैनात है और वेतन प्रति माह 92,000 रुपये है। तर्क दिया कि कटौती के बाद मिलने वाले वेतन में उनके पास सीमित आर्थिक संसाधन बचते हैं।

    कटौतियों में प्रोविडेंट फंड और बीमा के साथ-साथ ऋण की किस्तें भी हैं। हाई-रिस्क पोस्टिंग से स्थानांतरण के बाद मासिक वेतन करीब 72 हजार रुपये होगा।

    याचिका में कहा गया कि आर्थिक उत्तरदायित्व के रूप में अपनी मां और भाई की मदद करने का जिम्मा भी उन्हीं पर है। परिवार न्यायालय ने उनके इन तथ्यों पर विचार नहीं किया।

    न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने परिवार न्यायालय के आदेश को यथावत रखते हुए माना कि जवान की मानी गई कमाई को देखते हुए अंतरिम भरण-पोषण की 10 हजार रुपये की राशि अधिक या मनमानी नहीं लगती।

    पत्नी का भरण-पोषण मांगने का अधिकार सही है। यह आर्थिक मदद केस के अंतिम निर्णय आने तक पत्नी की गरिमा और जीवनयापन को सुनिश्चित करने के लिए थी।

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