जंगलों की आग से नैनीताल की हवा हुई जहरीली, सामान्य से 10 गुना तक बढ़ी ब्लैक कार्बन की मात्रा
नैनीताल और आसपास के जंगलों में लगी आग से वायुमंडल में ब्लैक कार्बन और कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा दस गुना बढ़ गई है, जिससे मानव स्वास्थ्य और जलवायु प ...और पढ़ें

नैनीताल के आलूखेत क्षेत्र के जंगल में बीते दिनों लगी आग

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नरेश कुमार, नैनीताल। शहर और समीपवर्ती क्षेत्र के जंगलों में लगी आग वन संपदा के साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ रही है। बीते दस दिनों से लगी आग न सिर्फ वन्य जीवों, वन संपदा व आबादी क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है, बल्कि इससे उत्सर्जित जहरीली गैस से मानव स्वास्थ्य और जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
15 फरवरी से अब तक के फायर सीजन में प्रदेश में 198 आग की घटनाएं हो चुकी हैं। जिसमें 120 हेक्टेयर से अधिक जंगल जल चुका है। नैनीताल में महज दस दिनों से लगी आग से वायु मंडल के लिए खतरनाक माने जाने वाले ब्लैक कार्बन और कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा में दस गुना से भी अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पीएम 2.5 के स्तर के साथ ही तापमान में भी बढ़ोतरी हो रही है।
बता दें कि 15 फरवरी के 15 जून तक माना जाने वाला फायर सीजन जंगलों में आग लगने के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है। चीड़ वनों की अधिकता वाला जिले का पहाड़ी क्षेत्र बीते दस दिनों से धधक रहा है। जिसकी रोकथाम वन विभाग के लिए भी चुनौती बना हुआ है।
जंगलों में लगी आग से एक ओर वन संपदा, वन्य जीवों को क्षति पहुंच रही है तो दूसरी ओर यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी घातक साबित हो रही है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान एरीज के पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र सिंह ने बताया कि जंगलों में आग लगने से बीते दस दिनों में वायु प्रदूषण में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
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आग की घटनाओं से पूर्व पहाड़ों पर ब्लैक कार्बन की उपस्थिति न्यूनतम दर्ज की गई थी जिसमें दस गुना तक बढ़ोतरी हुई है। सामान्य दिनों में एक से दो नैनोग्राम प्रति मीटर क्यूब दर्ज किया जाने वाला ब्लैक कार्बन इन दिनों 15-20 के बीच पहुंच गया है।
वहीं 8 से 10 रहने वाला पार्टिकुलेट मैटर 2.5 भी बढ़कर करीब 25 के आसपास पहुंच गया है। मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे हानिकारक मानी जाने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड में भी बढ़ोतरी हुई है।
मानव स्वास्थ्य व ग्लेशियरों के लिए हानिकारक है ब्लैक कार्बन व कार्बन मोना ऑक्साइड
डॉ. नरेंद्र ने बताया कि ब्लैक कार्बन जीवाश्म ईंधन या लकड़ी के अपूर्ण दहन पर उत्सर्जित होने वाला पदार्थ है। उत्सर्जन के बाद यह वायुमंडल में एक से दो सप्ताह तक स्थिर रह सकता है। जिससे वायुमंडलीय दाब में बढ़ोतरी होती है। बढ़ते तापमान के साथ ही ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने में इसकी अत्यधिक भूमिका है।
इसके अलावा आग लगने के बाद सर्वाधिक हानिकारक कार्बन मोनो ऑक्साइड भी उत्सर्जित होता है। जोकि हवा में दो माह तक रहती है। वहीं आग लगने के बाद धूल के कण हवा में उड़ने के बाद पीएम 2.5 के स्तर में बढ़ोतरी होती है। यह कण इतने छोटे होते है कि आसानी से सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। धूल के साथ धातु के कण मिले होने के कारण फेफड़ों से संबंधित समस्या बढ़ जाती है।
198 घटनाएं, 120 हेक्टेयर से अधिक जंगल जले
बढ़ता तापमान व चटक वनाग्नि के लिहाज से परेशानी खड़ी कर रहा है। प्रदेश में 15 फरवरी से शुरु हुए फायर सीजन में अब तक 198 वनाग्नि की घटनाए रिकार्ड की गई है। जिसमें 120.27 हेक्टयर जंगल जला है।
वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइड के आकड़ों की माने तो कुमाऊ रिजन के रिजर्व फारेस्ट व सिविल सोयम में 23 आग की घटनाओं में 17.15 हेक्टेयर, गढ़वाल रीजन में 154 घटनाओं में 90.57 हेक्टेयर व प्राणि उद्यान क्षेत्रों में 21 घटनाओं में 12.55 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो चुका है।