यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 31, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
नदी-पहाड़ पार कर पांच दिन तक पैदल चलने के बाद हरकारा डाक लेकर पहुंचता है गांव
डिजिटल इंडिया में भी मुनस्यारी तहसील के दूरस्थ गांवों में आज भी अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनी नीति के तहत डाक पैदल पहुंचाए जाते हैं। ...और पढ़ें

पिथौरागढ़/ मदकोट, जेएनएन : शहरों की सुविधाओं का सुख भोगने वाले पहाड़ की पीड़ा कैसे जान पाएंगे। जानना हो तो उत्तराखंड के इस सीमांत इलाके का दर्द समझिए। जीवन की मूलभूति सुविधाओं को भी कड़ी मशक्कत के बाद हासिल करने वाले लाेगों को बाहर रह रहे अपनों की खबर और उनके भेजे हुए पैसे बड़ी मशक्कत से मिलते हैं। एक हरकारा जब पांच दिन तक नदी पहाड़ पार करते हुए पैदल सुरक्षित गांव पहुंचता है, तब ग्रामीणों को अपनों की खबर और उनके भेजे हुए पैसे मिलते हैं।
देश को आजाद हुए 72 साल हो चुके हैं। इस दौरान कहने को तो इंडिया डिजिटल बन चुका है, बावजूद इसके सीमांत इलाकों की समस्याएं और चुनौतियां आदिम समय जैसी हैं। मुनस्यारी तहसील के दूरस्थ गांवों में आज भी अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनी नीति के तहत डाक पैदल पहुंचाए जाते हैं। तहसील क्षेत्र से ही भेजे गए पत्र पहुंचने में पांच दिन लगते हैं तो जिला मुख्यालय से गांवों तक डाक पहुंचने में आठ दिन का समय लगता है।
देश में तमाम व्यवस्थाएं बदल चुकी हैं परंतु सीमांत तहसील मुनस्यारी की डाक व्यवस्था अभी भी अंगे्रजी हुकूमत की चल रही है। अंग्रेज शासनकाल में वर्ष 1947 से पूर्व तक मुनस्यारी के लिए डाक व्यवस्था अल्मोड़ा से बागेश्वर होते हुए पिथौरागढ़ के तेजम तक पहुंचती थी। तब यह क्षेत्र पैदल था और पैदल दूरी में यह मार्ग सबसे सहज था। तेजम से डाक हरकारे तल्ला-मल्ला जोहार तक डाक पहुंंचाते थे। तब यह नियम था कि डाक लेकर जाने वाला हरकारा दिन भर जितना पैदल चल सकता है चले और अगले दिन आगे को चले ।
इस व्यवस्था के तहत तहसील के तेजम से चलने वाला हरकारा तहसील के ही बौना गांव तक पांच दिन में पहुंच पाता था। तेजम से बौना जाने वाले हरकारे को जाकुर, गोरी, मंदाकिनी नदियां पार करनी पडती थी। तेजम से बौना की पैदल दूरी 60 किमी है । तेजम से बौना तक अब सड़क है । सड़क से यह दूरी 94 किमी है। वाहन से चलने पर चार से साढ़े चार घंटे का समय लगता है। विडंबना यह है कि डाक आज भी तेजम से बौना तक पैदल जाती है। जिसमें हरकारे को पांच दिन का समय लगता है। एक दर्जन से अधिक उतार और चढ़ाव के मार्ग पार करने पड़ते हैं।
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तेजम से डाक हरकारा कंधे में डाक का थैला डालकर चलता है। पहले दिन तेजम से गिरगांव पहुंचता है। दूसरे दिन का सफर गिरगांव से मुनस्यारी तक का होता है। तीसरे दिन मुनस्यारी से सेबिला होते हुए डाक मदकोट पहुंंचती है, चौथे दिन मदकोट से निर्ताेली गांव डाक पहुंचती है। पांचवें दिन निर्ताेली से बौना गांव डाक पहुंचती है।
मनीऑर्डर को लेकर परेशान रहते हैं ग्रामीण
यह क्षेत्र ग्रामीण है। यहां पर बैंक नहीं हैं। अधिकांश लोग देश के अलग-अलग स्थानों पर नौकरी करते हैं और अपने परिवार के लिए मनीआर्डर भेजते हैं। दिल्ली से मुनस्यारी के लिए भेजे जाने वाले मनीआर्डर तीसरे दिन तहसील के तेजम गांव पहुंच जाते हैं परंतु तहसील के ही तेजम गांव से बौना गांव तक पहुंचने में पांच दिन लग जाते हैं। जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से भेजे जाने वाले मनीआर्डर भी बौना गांव में आठवें दिन पहुंचते हैं। जबकि जिला मुख्यालय से वाहन से बौना गांव पहुंचने में छह से सात घंटे लगते हैं। जिसमें कुछ किमी पैदल चलना पड़ता है।