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    बायोमेडिकल वेस्ट से बीमार हो रहे उत्तराखंड के पहाड़, मैदान में भी घोर लापरवाही

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 02:05 PM (IST)

    कुमाऊं में अस्पतालों की लापरवाही से बायोमेडिकल वेस्ट हवा, पानी और पर्यावरण को दूषित कर रहा है। प्रतिदिन 2755 किलोग्राम कचरा उत्पन्न होता है, लेकिन निस ...और पढ़ें

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    जागरण संवाददाता, हल्द्वानी । कुमाऊं की शुद्ध हवा व पानी को बायोमेडिकल वेस्ट (जैव चिकित्सा कचरा) दूषित कर रहा है। इसका कारण अस्पतालों की बड़ी लापरवाही है।

    मैदानी क्षेत्रों में ट्रेंचिंग ग्राउंड में बड़ी मात्रा में संक्रामक कूड़ा मिल रहा है तो पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों, जंगलों व गाड़-गधेरों में फेंके इस घातक कूड़े ने गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर दिया है, जिस गति से अस्पतालों की संख्या बढ़ने लगी है, उसके अनुरूप बायोमेडिकल वेस्ट निस्तारण की सुविधा नहीं है।

    कुमाऊं में ही प्रतिदिन करीब 2755 किलोग्राम बायोमेडिकल वेस्ट उत्पन्न हो रहा है, लेकिन निस्तारण को लेकर केवल दो ही इंसीनरेटर हैं। डीप बरियल की प्रक्रिया में भी घोर लापरवाही बरती जा रही है। इसके बावजूद जिम्मेदार मौन धारण किए हुए हैं।

    हाई कोर्ट ने पिथौरागढ़ में खुले में बायोमेडिकल वेस्ट डालने के मामले में दायर जनहित याचिका पर राज्य सरकार व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है, जबकि यह समस्या केवल पिथौरागढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ के चार अन्य जिलों के साथ ही नैनीताल व ऊधम सिंह नगर में भी बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण में हर स्तर पर मनमानी चल रही है।

    यहां तक कि पीसीबी की ओर से ही कुमाऊं के 535 अस्पतालों को नोटिस दिया गया है, जबकि ऐसे कई अस्पताल हैं, जिन पर पीसीबी भी नहीं पहुंच सका है। यह अस्पताल नियम के विरुद्ध बायोमेडिकल वेस्ट निस्तारित कर रहे हैं।

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    यह भी बड़ी लापरवाही

    बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम-2016 के तहत ऐसे कचरे का रंगवार पृथक्करण करना जरूरी है। इसके लिए पीला, लाल, सफेद और नीला डिब्बा रखना अनिवार्य। इसमें निर्धारित कूड़ा डालना है, लेकिन नर्स, वार्ड ब्वाय ऐसा नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए कि कहीं पर स्टाफ पर्याप्त नहीं है और कहीं पर रंगवार डिब्बे ही ठीक से नहीं रखे जाते हैं। पीसीबी से अनुमति के बाद भी कई बार पूरा कूड़ा इंसीनरेटर तक नहीं भेजा जाता है। यह कूड़ा खुले में फैल जाता है। इसकी मानिटरिंग तक नहीं होती है। इसकी वजह से गंभीर संक्रामक बीमारियां होने का खतरा बना रहता है।

    यह है स्थिति

    • 2033 अस्पताल के पास ही कुमाऊं में पीसीबी की अनुमति
    • 535 अस्पतालों को भेजा गया है नोटिस
    • 505 अस्पताल केवल ऊधम सिंह नगर के हैं, जिन्हें नोटिस दिया है
    • 2755 किलोग्राम प्रतिदिन कुमाऊं से बायोमेडिकल वेस्ट निकलता है

    डीप बरियल को लेकर भी लापरवाही

    बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट के तहत यह व्यवस्था पांच लाख से कम की आबादी के लिए ही मान्य है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर गड्ढा सही ढंग से नहीं बना है, तो वर्षा का पानी कचरे में मिलकर पीने के पानी (भूजल) को दूषित कर सकता है। इसमें सिर्फ विशेष कचरा ही दबाया जा सकता है। प्लास्टिक, कांच और सुई के लिए यह सही नहीं है। गड्ढों के रख-रखाव में लापरवाही से बदबू और आवारा जानवरों के जरिये खतरा बढ़ सकता है।

    यह होनी चाहिए व्यवस्था

    कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए करीब पांच वर्ष पहले अल्मोड़ा में इंसीनरेटर लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद वहां पर मेडिकल कालेज भी खुल गया है, लेकिन अभी तक इंसीनरेटर लगाने की कई प्रक्रिया तक नहीं चल रही है, जबकि अल्मोड़ा में यह सुविधा मिलने से पर्वतीय क्षेत्रों में बायोमेडिकल वेस्ट निस्तारित हो सकता है।

    बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण सही तरीके से होता रहे। इसके लिए निगरानी की जाती है। अनुमति नहीं लेने वाले कुमाऊं पांच जिलों के 30 अस्पतालों को नोटिस भी दिया गया है। साथ ही उचित कार्रवाई भी की जाती है। - अनुराग नेगी, क्षेत्रीय प्रबंधक, पीसीबी हल्द्वानी

    ऊधम सिंह नगर के अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल वेस्ट का संग्रहण गदरपुर एनवायरमेंट साल्यूशन की ओर से किया जाता है। इसके बाद वेस्ट प्रोसेसिंग फैसिलिटी में निर्धारित वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत उसका सुरक्षित निस्तारण किया जाता है। अनुमति नहीं लेने वालों को नोटिस भेजा गया है। - एसपी सिंह, क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी, काशीपुर