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    छह साल बाद पार्वती देवी के पैरों में आई नई जान, श्रीनगर बेस अस्पताल में हुआ सफल घुटना प्रत्यारोपण

    Updated: Sat, 04 Jul 2026 06:12 PM (IST)

    छह साल से गठिया से पीड़ित और एक किडनी के साथ बिस्तर पर पड़ी पार्वती देवी का बेस चिकित्सालय श्रीनगर में सफल घुटना प्रत्यारोपण हुआ। ...और पढ़ें

    डा. डीके टम्टा की निगरानी में बेस अस्पताल के सर्जरी वार्ड परिसर में अपने पैरों पर चलती पार्वती देवी। जागरण

    डा. डीके टम्टा की निगरानी में बेस अस्पताल के सर्जरी वार्ड परिसर में अपने पैरों पर चलती पार्वती देवी। जागरण

    HighLights

    1. छह साल से गठिया से पीड़ित पार्वती देवी को मिली नई जिंदगी

    2. एक किडनी के साथ जटिल घुटना प्रत्यारोपण बेस चिकित्सालय श्रीनगर में सफल

    3. आयुष्मान योजना से नि:शुल्क इलाज, परिवार को मिली राहत

    विनय बहुगुणा, श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में गंभीर बीमारियां अक्सर किसी अभिशाप की तरह जिंदगी को लाचार बना देती हैं, लेकिन बेस चिकित्सालय श्रीकोट-श्रीनगर में हुआ एक सफल आपरेशन किसी चमत्कार से कम नहीं है।

    बागेश्वर जनपद के खरई-लोब गांव की 45 वर्षीय पार्वती देवी पिछले छह वर्षों से गठिया के कारण रेंगकर जीने को मजबूर थीं और छह महीने से पूरी तरह बिस्तर पर थीं। उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि उनके शरीर में सिर्फ एक ही किडनी काम कर रही थी।

    इस बेहद संवेदनशील और जटिल स्थिति को देखते हुए हड्डी रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डा. दयाकृष्ण टम्टा और उनकी टीम ने विशेष चिकित्सकीय प्रोटोकाल के तहत दवाएं दीं और आयुष्मान योजना के अंतर्गत उनका निश्शुल्क सफल आपरेशन किया।

    दोनों घुटनों के सफल प्रत्यारोपण (टोटल नी रिप्लेसमेंट) के बाद जब शुक्रवार को पार्वती देवी ने बिना किसी सहारे के अपने कदम बढ़ाए, तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

    फफकते हुए कहा, मेरे जीवन में इससे बड़ा कोई चमत्कार नहीं हो सकता। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वह कभी सामान्य जीवन की तरफ कदम बढ़ा सकेंगी।

    एक किडनी की चुनौती के बीच चार घंटे चला जटिल आपरेशन

    गंभीर आस्टियो आर्थराइटिस (गठिया) से पीड़ित पार्वती देवी के दोनों घुटने पूरी तरह क्षतिग्रस्त होकर मुड़ चुके थे।

    बीती दो जून को उन्हें अस्पताल लाया गया, जहां जांच के दौरान पता चला कि महिला की सिर्फ एक ही किडनी है। इस कारण एनेस्थीसिया देना और आपरेशन बेहद जोखिम भरा था।

    डा. टम्टा ने बताया कि किडनी की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ही दवाओं का चयन किया गया और 12 दिनों तक पैरों के खिंचाव सहित अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की गईं।

    इसके बाद 16 जून को चार घंटे से अधिक समय तक चले आपरेशन में दोनों घुटनों का सफल प्रत्यारोपण किया गया। आयुष्मान भारत योजना के कारण यह पूरा इलाज पूरी तरह मुफ्त हुआ।

    फिजियोथेरेपी और डाक्टरों की कड़ी निगरानी के बाद महिला पूरी तरह चलने फिरने लगी हैं। रविवार को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।

    अपनों के सहयोग से भाव-विभोर हुईं

    पार्वती देवी ने बताया कि उनके देवर मनोज कुमार ने अपने खर्च पर उन्हें श्रीनगर भेजा, जबकि ग्राम प्रधान बीना देवी और बड़ी बहन बिमला ने हर मोड़ पर उनका साथ दिया। उन्होंने भावुक होकर कहा कि वह इन सब लोगों का ऋण कभी नहीं चुका पाएंगी।

    लाचार माता-पिता के साथ 14 साल की निहारिका का संघर्ष भी कम नहीं रहा

    पार्वती देवी के घर की परिस्थितियां किसी को भी झकझोर सकती हैं। उनके पति शेखर चंद पिछले 15 वर्षों से लकवाग्रस्त हैं और दोनों हाथ-पैर के बल घिसटकर चलते हैं।

    छह महीने पहले जब पार्वती देवी भी बिस्तर पर आ गईं, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनकी 14 वर्षीय इकलौती बेटी निहारिका के कंधों पर आ गई। कक्षा दसवीं में पढ़ने वाली निहारिका रोजाना स्कूल के लिए छह किलोमीटर पैदल दूरी नापती है।

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    स्कूल से लौटकर वह लाचार माता-पिता के लिए चाय, पानी और भोजन बनाती है और इस भारी मानसिक व शारीरिक दबाव के बीच अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए है। मां के चलने-फिरने लायक होने से उसकी परेशानियों में कमी आने की उम्मीद है।

    दूसरी ओर आपरेशन के बाद अपने पैरों पर खड़ी हुई पार्वती ने कहा कि जब वह बिस्तर पर थीं, तो उन्हें सिर्फ अपनी बेटी की चिंता सताती थी। लेकिन अब ठीक होने के बाद बिटिया और दिव्यांग पति को अपने हाथों से खाना बनाकर खिला सकेंगी। उनकी देखभाल कर सकेंगी।

    पार्वती देवी छह वर्ष से गठिया (आस्टियो आर्थराइटिस) की गंभीर समस्या से पीड़ित थीं। उनके दोनों घुटने पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिस कारण खड़ी भी नहीं हो सकती थीं। अब पार्वती का अपने पैरों पर चलना, मेरे व मेरी टीम के लिए बड़ी खुशी के क्षण हैं। गठिया या अन्य प्रकार की कोई भी समस्या हो, प्रारंभिक स्तर पर ही चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए, जिससे स्थिति गंभीर न हो।

    -- डा. दयाकृष्ण टम्टा, विभागाध्यक्ष हड्डी रोग अनुभाग, बेस चिकित्सालय श्रीकोट-श्रीनगर

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