ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में बैलास्टलेस तकनीक से बिछेगा रेलवे ट्रैक, निर्माण में आई तेजी
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में अब बैलास्टलेस तकनीक से ट्रैक बिछाने का कार्य शुरू हो गया है, जिससे निर्माण में तेजी आई है। ...और पढ़ें

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे परियोजना के तहत निर्मित सुरंग में बिछाई जाएगी बैलास्टलेस ट्रैक। जागरण

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जागरण संवाददाता, श्रीनगर गढ़वाल (पौड़ी)। महत्वाकांक्षी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना ने अब रफ्तार पकड़ ली है। रेल परियोजना में आधुनिक बैलास्टलेस तकनीक से ट्रैक बिछाने का कार्य शुरू होने के साथ निर्माण कार्य में तेजी आई है।
ऋषिकेश से लेकर कर्णप्रयाग तक पूरे 126 किलोमीटर ट्रैक पर इसी तकनीक का उपयोग किया जाएगा।
बेहतरीन इंजीनियरिंग का उदाहरण बन रही ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना में अब अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो गया है।
पूर्व में इस परियोजना के तहत सुरंग निर्माण के लिए टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) का प्रयोग किया गया था।
अब बैलास्टलेस तकनीक से ट्रैक बिछाने का कार्य किया जा रहा है, इसके साथ ही परियोजना के कार्य में तेजी आने की उम्मीद है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पैकेज-2 में शिवपुरी से ब्यासी तथा पैकेज-5 में लक्षमोली से मलेथा (कीर्तिनगर) के बीच बैलास्टलेस तकनीक से निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। इन हिस्सों में सिविल कार्य पूरा होने के बाद रेल ट्रैक बिछाया जाएगा।
इस कार्य के लिए रेल विकास निगम लिमिटेड द्वारा टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। रेलवे की इरकान इंटरनेशनल लिमिटेड, पीसीएम और पारस कंपनी नई दिल्ली के संयुक्त उपक्रम को लगभग 750 करोड़ रुपये की लागत से बैलास्टलेस ट्रैक बिछाने का जिम्मा दिया गया है।
यही एजेंसियां रेलवे लाइन के साथ-साथ स्टेशनों के निर्माण कार्य को भी अंजाम देंगी। तकरीबन 16,216 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रही इस परियोजना का निर्माण कार्य वर्ष 2019 में शुरू हुआ था।
प्रारंभिक लक्ष्य इसे वर्ष 2025 तक पूरा करने का था, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और तकनीकी चुनौतियों के कारण अब इसकी समयसीमा बढ़ाकर दिसंबर 2028 कर दी गई है।
परियोजना के तहत लगभग सभी साइटों पर सुरंग निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है। अब ट्रैक बिछाने, रेलवे स्टेशन निर्माण समेत अन्य कार्यों में आरवीएनएल जुटा हुआ है।
रेल विकास निगम लिमिटेड के उप-महाप्रबंधक सिविल, ओमप्रकाश मालगुडी के अनुसार परियोजना के तहत शिवपुरी, ब्यासी और लक्षमोली-मलेथा खंड में बैलास्टलेस तकनीक से कार्य शुरू कर दिया गया है। इस तकनीक से रेलवे ट्रैक अधिक मजबूत, टिकाऊ और आधुनिक स्वरूप में तैयार होगा। पूरे 126 किलोमीटर ट्रैक पर इसी तकनीक का उपयोग किया जाएगा।

13 रेलवे स्टेशनों का भी होना है निर्माण
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में कुल 13 रेलवे स्टेशन प्रस्तावित हैं। परियोजना का बड़ा हिस्सा सुरंगों के भीतर से होकर गुजरेगा।
कुल 17 सुरंगों में से लगभग 105 किलोमीटर रेल मार्ग सुरंगों के अंदर से निकलेगा। इनमें देवप्रयाग से जनासू के बीच सबसे लंबी करीब 14.08 किमी सुरंग है, जबकि सेवई से कर्णप्रयाग के बीच सबसे छोटी लगभग 200 मीटर की सुरंग है।
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इसलिए जरूरी है बैलास्टलेस ट्रैक
126 किमी लंबी ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेलवे परियोजना का अधिकांश हिस्सा सुरंगों के भीतर से होकर गुजरेगा। ऐसे में बैलास्टलेस तकनीक का उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
पारंपरिक गिट्टी आधारित ट्रैक सुरंगों के अंदर लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माने जाते, क्योंकि वहां नमी, पानी का रिसाव, सीमित जगह और रखरखाव की कठिनाईयां रहती हैं। इसके विपरीत कंक्रीट आधारित बैलास्टलेस ट्रैक ज्यादा मजबूत, स्थिर और कम रखरखाव वाला होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार सुरंगों में इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बार-बार मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ती और ट्रैक अपनी स्थिति लंबे समय तक बनाए रखता है। साथ ही, इससे ट्रेनों का संचालन अधिक सुरक्षित रहता है, कंपन भी कम होता है और गति बेहतर बनी रहती है।
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