कारगिल विजय दिवस: सीने में आज भी दुश्मन की गोली का टुकड़ा, पर नहीं डिगा हौसला
कारगिल युद्ध के नायक दान सिंह मेहता ने द्रास सेक्टर में पांच गोलियां खाईं, आज भी सीने में गोली का टुकड़ा है, पर उनका हौसला बरकरार है। सेवानिवृत्ति के ...और पढ़ें

कारगिल के द्रास सेक्टर में मौत से आंख मिलाकर लड़े चंपावत के वीर नायक दान सिंह मेहता।

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बृजेश पांडेय, चंपावत । कारगिल विजय दिवस की हर वर्षगांठ देश के उन रणबांकुरों की वीरगाथा को फिर जीवंत कर देती है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। चंपावत के वीर सपूत नायक (सेवानिवृत्त) दान सिंह मेहता उन्हीं योद्धाओं में शामिल हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में दुश्मन की पांच गोलियां झेलने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। उनके सीने में आज भी नौ एमएम की गोली का एक टुकड़ा फंसा है, जो उनके अदम्य साहस और देशभक्ति की अमिट निशानी है।
दान सिंह मेहता पुत्र श्रीनाथ सिंह वर्ष 1986 में वह भारतीय सेना की 12वीं जाट रेजीमेंट में सिपाही के पद पर भर्ती हुए। करीब 15 साल तक देश की सेवा करने के बाद वर्ष 2001 में नायक के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेना से लौटने के बाद उन्होंने आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुना और वर्तमान में परिवार के भरण-पोषण के लिए एक दुकान चला रहे हैं।
2001 में नायक के पद से सेवानिवृत्त
उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी हैं, जो वर्तमान में पढ़ाई कर रहे हैं। साल 1999 में कारगिल के द्रास सेक्टर की करीब 21 हजार फीट ऊंची बर्फीली चोटियों पर भारतीय सेना दुश्मन से निर्णायक युद्ध लड़ रही थी। ऊंचाई पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक लगातार भारतीय जवानों पर गोलियां बरसा रहे थे। विषम परिस्थितियों और जानलेवा मौसम के बावजूद भारतीय सैनिकों के कदम नहीं रुके।
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दान सिंह मेहता बताते हैं कि 25 जुलाई 1999 की शाम करीब सात बजे 12वीं जाट रेजीमेंट की 12 सदस्यीय टुकड़ी को तत्कालीन कमांडिंग आफिसर कर्नल समीर विसारिया के नेतृत्व में दुश्मन के कब्जे वाले मोर्चे पर हमला करने का आदेश मिला। जैसे ही भारतीय जवान आगे बढ़े, पाकिस्तानी सैनिकों ने ऊंचाई से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
गोलियों की बौछार के बीच भी भारतीय जवान डटे रहे। इस भीषण संघर्ष में एक सूबेदार और एक जवान वीरगति को प्राप्त हो गए, जबकि दान सिंह मेहता गंभीर रूप से घायल हो गए। दुश्मन की तीन गोलियां उनके बाजू में और दो गोलियां पैरों में लगीं। वहीं नौ एमएम की गोली का एक टुकड़ा उनके सीने में धंस गया, जिसे चिकित्सक आज तक नहीं निकाल सके।
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। उनका कहना है कि 'देश की रक्षा करते हुए मिला हर घाव मेरे लिए सम्मान का प्रतीक है।' आज भी उनके शरीर पर कारगिल युद्ध के जख्म मौजूद हैं, लेकिन चेहरे पर वही गर्व और आत्मविश्वास दिखाई देता है। सेना की वर्दी उतारने के बाद भी वह अपने संघर्ष, अनुशासन और कर्मठता से समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। उनकी जीवनगाथा युवाओं को यह संदेश देती है कि सच्चा सैनिक परिस्थितियां कैसी भी हों, राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखता है।