प्रकृति-संस्कृति का अनुभव 'आदि कैलास यात्रा' को बनाएगा यादगार, श्रद्धालुओं के लिए पर्यटन और होम-स्टे की नई संभावना
आदि कैलास यात्रा 8 मई से शुरू हो रही है, जो पिथौरागढ़ के अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और संस्कृति का अनुभव कराएगी। यात्री जौलजीबी, धारचूला, मुनस्यारी जैसे ...और पढ़ें


समय कम है?
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ओपी अवस्थी, पिथौरागढ़। उत्तराखंड में नेपाल-चीन सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले का नैसर्गिक सौंदर्य अपने आप में अद्भुत है। आठ मई से प्रसिद्ध आदि कैलास यात्रा शुरू होने के साथ ही इस पूरे क्षेत्र में तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगेगी।
आदि कैलास की यात्रा केवल धार्मिक आस्था का मार्ग ही नहीं, बल्कि हिमालयी प्रकृति, संस्कृति और स्थानीय जीवन को करीब से देखने का भी अवसर बन सकती है। यदि तीर्थ यात्री अपने कार्यक्रम में थोड़ा समय निकालें तो पिथौरागढ़ और उसके आसपास के कई ऐसे स्थल हैं, जहां ठहरकर वे इस पूरे अनुभव को और समृद्ध बना सकते हैं।
पिथौरागढ़ में मौजूद शिव के धाम के साथ स्वयं को आध्यात्म से जोड़ने के साथ ही आप यहां प्रकृति के विविध रूपों के बीच अपने टूर प्लान को और अधिक रोमांचकारी बना सकते हैं। यहां के तमाम पर्यटक स्थल आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। यहां पांच प्रमुख नदियों के संगम पर टहलिए या फिर भारत में खड़े होकर नदी पार नेपाल को देख लीजिए। नदी-घाटी-झरने, बुग्याल-ग्लेशियर-हिमाच्छादित चोटियों के साथ ही सुरम्य वन आपको प्रकृति के बीच होने का भरपूर अनुभव देंगे।
पिथौरागढ़ पहुंचने के लिए हल्द्वानी से 216 किलोमीटर और टनकपुर से 150 किलोमीटर की सड़क मार्ग से यात्रा करनी पड़ती है। सोर घाटी के नाम से प्रसिद्ध पिथौरागढ़ अपनी भौगोलिक संरचना के चलते मिनी कश्मीर के नाम से जाना जाता है। यहां स्थित नैनी सैनी हवाई पट्टी से दिल्ली और देहरादून के लिए नियमित सेवा उपलब्ध है।
जौलजीबी: काली और गोरी नदी के संगम पर नेपाल सीमा पर स्थित जौलजीबी कैलास मानसरोवर यात्रा का द्वार कहा जाता है। यहां पर भारत-नेपाल को जोड़ने वाला काली नदी पर जिले का सबसे लंबा झूला पुल है। नेपाल से लोग जौलजीबी बाजार में खरीदारी को आते हैं। यह काली व गोरी नदी का संगम है और यहां प्राचीन ज्वालेश्वर महादेव के दर्शन आप कर सकते हैं।
धारचूला : नेपाल-चीन सीमा पर स्थित प्रथम नगर है। काली नदी किनारे स्थित धारचूला ही कैलास मानसरोवर व आदि कैलास यात्रा का बेस कैंप भी है। यहीं से उच्च हिमालयी व्यास और दारमा घाटी तथा चीन सीमा लिपुलेख तक सड़क मार्ग से पहुंचा जाता है। धारचूला में काली नदी उस पार नेपाल का दार्चुला नगर है। जहां आप घूमने भी जा सकते हैं।
कालापानी : काली नदी के उद्गम स्थल यानी कालापानी से ही भारत-नेपाल सीमा आरंभ होती है। समुद्रतल से 11 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित कालापानी में प्रसिद्ध काली माता का मंदिर है।
गुंजी : साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित गुंजी भारत-चीन सीमांत स्थलीय व्यापार की भारतीय मंडी है। यहां आइटीबीपी, एसएसबी, सेना और बीआरओ के कैंप हैं। वाइब्रेंट विलेज गुंजी से ही ओम पर्वत और आदि कैलास को जाया जाता है। पहाड़ों की तलहटी पर स्थित गुंजी में लोगों ने पर्यटकों के लिए होम स्टे विकसित किए हैं।
पंचाचूली ग्लेशियर : दारमा घाटी में स्थित पंचाचूली ग्लेशियर तक पहुंचना अपने आप में एक रोमांच है। सड़क मार्ग के बाद मात्र तीन किमी पैदल दूरी तय कर ट्रेकिंग के शौकीन ग्लेशियर तक पहुंच सकते हैं। मार्च से जून यहां ट्रेकिंग के लिए सबसे उपयुक्त समय रहता है। मान्यता है कि पंचाचूली यानी पांच चूल्हों पर पांडवों ने अंतिम समय में भोजन तैयार किया था।
नारायण आश्रम : समुद्र तल से 8950 फीट की ऊंचाई पर स्थित नारायण आश्रम प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्र हैं। कैलास मानसरोवर यात्रा का कभी यह भी पड़ाव होता था। यह स्थल काफी शांत माना जाता है, जो योग व ध्यान के लिए उपयुक्त है। पिथौरागढ़ से 136 किमी दूर यह आश्रम देवदार के वृक्षों से घिरा है। आश्रम में ठहरने के लिए अन्नापूर्ण भवन है।
मुनस्यारी : हिमनगरी के नाम से प्रसिद्ध मुनस्यारी में सालभर पर्यटकों का आना-जाना रहता है। यहां दिसंबर-जनवरी में ताजी बर्फ गिरते हुए देखना शानदार अनुभव रहता है। गर्मियों के दिनों यहां से पंचाचूली चोटी के विराट दर्शन होते हैं। मुनस्यारी से 35 किमी दूर सुंदर बिर्थी फाल है। सवा सौ मीटर की ऊंचाई से यह झरना गिरता है। यहां विश्राम करना आपको गजब की शीतलता की अनुभूति देगा।
चौकोड़ी : चौकोड़ी एक ऐसा पर्यटन स्थल है, जहां से गढ़वाल से लेकर नेपाल की हिमशृंखला मानो सामने ही नजर आती है। चौकोड़ी को टी स्टेट भी कहा जाता है। चाय बागान के साथ ही यहां का नैसर्गिक सौंदर्य अद्भुत है। यह वन्यजीव व पक्षी प्रेमियों के घूमने के लिए रमणीय स्थल है।
होम स्टे में स्थानीय व्यंजन
पिथौरागढ़ जिले के प्रमुख पर्यटक स्थलों पर ठहरने के लिए होटल, पर्यटक आवास गृह और होम स्टे की सुविधा है। पंचाचूली बेस कैंप में भी रात्रि निवास की सुविधा उपलब्ध है। यहां के होटलों में सीजन के दौरान एक से चार हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब में कमरे मिल जाएंगे। उच्च हिमालयी गांवों में दो हजार से लेकर सात हजार रुपये तक में होमस्टे की सुविधा मिलेगी।
खास बात यह है कि होम स्टे में आपको स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे। जिसमें भट, गहत व राजमा दाल, लाल चावल का भात, आलू के गुटके, मडुवा की रोटी तथा स्थानीय मौसमी सब्जियां आदि खास हैं। खाने-ठहरने का इंतजाम ऐसा होगा कि आपको घर जैसा अनुभव मिलेगा। इस बात का भी ध्यान रखें कि हिमालयी क्षेत्र में घूमने आ रहे हैं तो स्वास्थ्य जांच करा लें और गर्म कपड़े भी बैग में रखें।