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सीमा के रक्षकों की उफनते नाले से रोज जंग, पुल न होने से गले तक पानी में उतरकर निभा रहे ड्यूटी

Published: Fri, 24 Jul 2026 10:29 AM (IST)

खटीमा में नेपाल सीमा पर तैनात एसएसबी जवान सनिया नाले पर पुल न होने से रोज जान जोखिम में डालकर ड्यूटी कर रहे हैं।

HighLights

  1. एसएसबी जवान सनिया नाले को ट्यूब के सहारे पार करते

  2. बरसात में नाले का पानी गले तक पहुंच जाता है

  3. पुल निर्माण के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र भेजे गए

जागरण संवाददाता, खटीमा। नेपाल सीमा पर देश की सुरक्षा में दिन-रात मुस्तैद सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवान हर दिन एक ऐसी जंग भी लड़ रहे हैं जिसका दुश्मन कोई घुसपैठिया नहीं, बल्कि एक उफनता हुआ नाला है।

सीमा की चौकसी से पहले और बाद में उन्हें सनिया नाला पार करने के लिए तेज बहाव से जूझना पड़ता है। जरूरत का राशन और सामान ट्यूब पर रखकर नाले के इस पार से उस पार पहुंचाना उनकी रोजमर्रा की मजबूरी बन चुकी है।

सनिया नाले पर वर्षों से पुल नहीं

57वीं वाहिनी एसएसबी की ए-कंपनी यहां नेपाल सीमा से करीब ढाई किलोमीटर दूर सेमलघाट में तैनात है। कंपनी तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता नगरा तराई बाजार से होकर गुजरता है, लेकिन बीच में पड़ने वाले सनिया नाले पर वर्षों से पुल नहीं है।

ऐसे में जवानों को रोज करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर बाजार आना पड़ता है और वापसी में नाले की तेज धारा से संघर्ष करते हुए सामान कंपनी तक पहुंचाना पड़ता है। बरसात में यह संघर्ष और भयावह हो जाता है। कई बार पानी का स्तर जवानों के गले तक पहुंच जाता है।

हथियार, गोला-बारूद और सरकारी सामान के साथ नाला पार करना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। तेज बहाव और फिसलन के कारण हर कदम पर दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। पानी अधिक होने पर आवागमन पूरी तरह ठप हो जाता है, जिससे गश्त, ड्यूटी और अन्य सरकारी कार्य भी प्रभावित होते हैं।

कभी-कभार ट्रैक्टर-ट्रॉली का सहारा मिल जाता है, लेकिन अधिकांश समय जवानों को ट्यूब के सहारे ही सामान ढोना पड़ता है। धनुष पुल होकर है दूसरा रास्ता जरूर है, लेकिन वह पांच किलोमीटर से ज्यादा लंबा और बेहद जर्जर होने के कारण उपयोगी नहीं माना जाता। बारिश में गाड़ी नहीं जा पाती है।

हर मौसम में डटे रहते हैं जवान

ग्रामीणों का कहना है कि जो जवान देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए हर मौसम में डटे रहते हैं, उन्हें कम से कम सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलनी ही चाहिए। उनका मानना है कि सनिया नाले पर पुल का निर्माण केवल ग्रामीणों की सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा की मजबूती के लिए भी जरूरी है।

सहायक उप निरीक्षक दोरजे फुंशुक ने गश्त के दौरान बताया कि यहां से वाहन सर्दी और गर्मी में भी नहीं निकल पाते। इसलिए सरकारी वाहनों को जंगल के लंबे रास्ते से घुमाकर ले जाना पड़ता है, बारिश के दौरान वो भी संभव नहीं हो पाता है। जहां हर वक्त जंगली जानवरों का भय बना रहता है। यहां पर रास्ते के लिए उच्चाधिकारियों को पूर्व में पत्राचार किया गया है।

सीमा की सुरक्षा और ग्रामीणों के बीच समन्वय बनाने के लिए रास्ता सुगम होना चाहिए। इस दौरान जवान परमानंद, संजीव कुमार, संतेंद्र कुमार, वीरेंद्र, राहुल शर्मा, रतनेश कुमार ने बताया कि सनिया नाले में पानी हमेशा रहता है। बरसात में पानी गले तक पहुंच जाता है। यह नाला पार करना हर बार जोखिम भरा साबित होता है। इस नाले में हमेशा मगरमच्छ का भी खतरा बना रहता है।

पहले हृयूम पाइप के सहारे से हो रहा था आवागमन

ग्रामीण भगत सिंह के अनुसार करीब 14-15 वर्ष पहले क्षेत्रिय विधायक ने नाले पर ह्यूम पाइप डाले गए थे, जिसके बाद आने-जाने को ग्रामीण व एसएसबी के लिए सुगम हो गया था लेकिन कुछ समय बाद वो पाइप बरसात के तेज बहाव में बह गए। अब लोग सानिया नाले से पानी में उतकर ही गुजर रहे हैं।

छुट्टी पर जाने वाले जवान को चार लोग छोड़ने जाते हैं

मेलाघाट के बार्डर पर तैनात एसएसबी जवानों को रोजाना सनिया नाले को एक बार पार करना ही पड़ता है दिन में पेट्रोलिंग और रात में नाका करते हैं। एएसआई दोरजे फुंशुक बताते हैं जब कोई जवान छुट्टी पर घर जाता तब उसे छोड़ने को चार अन्य जवान साथ में जाते हैं जिससे जवान व सामान सुरक्षित मुख्य सड़क तक पहुंच सके। उन्होंने बताया कि बरसात में सुरक्षा की दृष्टी से दो जवान की ड्यूटी यहां पर रहती है उन्हें पार कराने के लिए उनकी मदद करते हैं।

नेपाल के लोग भी इसी सनिया नाले को पार कर पहुंचते हैं भारत

नाले के उस पर कुछ दूरी पर नेपाल बार्डर लग जाता है जहां नेपाल के दुधारा व चांदनी गांव है। यहां के नेपाली नागरिक सामान की खरीददारी करने को अलग-अलग संसाधनों से इसी सनिया नाले को पार कर खरीददारी करने को नगरा तराई या खटीमा बाजार पहुंचते हैं। गांव के लोग नाले के उस पार मवेशियों को चराने व उनका चारा लेने जाते हैं।

सनिया नाला वन विभाग की भूमि पर है। पुल निर्माण के लिए मुख्य विकास अधिकारी सहित कई उच्च अधिकारियों को पत्र भेजे जा चुके हैं। वाइब्रेंट विलेज योजना की बैठक में भी यह मुद्दा उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। - दीपक मेहरा, प्रधान नगरा तराई

समस्या के निदान के लिए मैं हर संभव प्रयास करुंगा। इसके लिए जिला पंचायत से पहले सर्वे कराया जाएगा। जल्द ही इसका समाधान कर दिया जाएगा- अजय मौर्य, जिला पंचायत अध्यक्ष, ऊधमसिंह नगर

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