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    तृणमूल चुनाव चिन्ह विवाद: ‘जोड़ा फूल’ हाथ से निकलने पर ‘सूरजमुखी’ सिंबल पर लड़ सकती हैं ममता

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 11:01 PM (IST)

    तृणमूल कांग्रेस के ममता और ऋतब्रत गुटों के बीच 'जोड़ा फूल' चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद जारी है, जिस पर चुनाव आयोग को फैसला लेना है। ...और पढ़ें

    ‘सूरजमुखी’ चुनाव चिन्ह पर लड़ सकती हैं ममता। (फाइल)

    ‘सूरजमुखी’ चुनाव चिन्ह पर लड़ सकती हैं ममता। (फाइल)

    HighLights

    1. ममता-ऋतब्रत गुटों के बीच 'जोड़ा फूल' चुनाव चिन्ह पर विवाद।

    2. ममता बनर्जी 'सूरजमुखी' चिन्ह पर चुनाव लड़ने की तैयारी में।

    3. चुनाव आयोग विवादित चिन्ह पर अंतिम निर्णय लेगा।

    राज्य ब्यूरो, कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस के दो गुटों (ममता बनर्जी व ऋतब्रत बनर्जी) के बीच चुनाव चिन्ह (जोड़ा फूल) को लेकर विवाद जारी है। दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के समक्ष अपने-अपने दस्तावेज जमा किए हैं, लेकिन अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

    इस बीच, दो विधानसभा (रेजीनगर व नंदीग्राम) और एक लोकसभा (बशीरहाट) सीट पर उपचुनाव नजदीक आने से प्रश्न उठने लगा है कि यदि चुनाव चिन्ह का विवाद समय पर नहीं सुलझा तो दोनों गुट किस प्रतीक पर चुनाव लड़ेंगे।

    सूत्रों के अनुसार, ममता ने वैकल्पिक रणनीति तैयार कर ली है। यदि जोड़ा फूल उनके हाथ से निकल जाता है तो वह ‘सूरजमुखी’ चुनाव चिन्ह पर उपचुनाव लड़ सकती हैं। दूसरी ओर, तृणमूल के बागी ऋतब्रत गुट की रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है। इस गुट के नेता विधायक प्रसून बनर्जी ने कहा कि आयोग सभी दस्तावेजों और कानूनी पहलुओं की जांच कर जो भी निर्णय देगा, वे उसे स्वीकार करेंगे।

    फिलहाल वैकल्पिक चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कोई विचार नहीं किया है। जानकारों के अनुसार ऐसे मामलों में आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेज, संगठनात्मक समर्थन व विधायी समर्थन की जांच कर अंतिम निर्णय लेता है। पार्टी के संविधान पर भी गौर किया जाता है।

    यदि आम चुनाव या उपचुनाव से पहले अंतिम फैसला संभव नहीं हो पाता तो आयोग मूल चुनाव चिह्न और कई बार पार्टी के नाम को भी ‘फ्रीज’ कर सकता है। इसके बाद दोनों गुटों को अलग अस्थायी नाम व नए चुनाव चिह्न आवंटित किए जाते हैं। अंतिम निर्णय होने पर मूल चुनाव चिह्न और नाम किसी एक गुट को सौंप दिया जाता है।

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    कई हैं उदाहरण

    लोक जनशक्ति पार्टी के मामले में रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग पासवान व पशुपति कुमार पारस गुट के बीच विवाद हुआ था। आयोग ने ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए थे। शिवसेना के मामले में आयोग ने मूल चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ और शिवसेना नाम को फ्रीज कर दिया था।

    उद्धव गुट को शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिह्न मिला था जबकि शिंदे गुट को ‘बालासाहेबंची शिवसेना’ नाम और ‘दो तलवार एवं ढाल’ चुनाव चिह्न दिया गया था। बाद में आयोग ने शिंदे गुट को वास्तविक शिवसेना मानते हुए धनुष-बाण उसी को थमाया।

    राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मामले में शरद पवार और अजित पवार गुट ने ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया था। सुनवाई के बाद आयोग ने अजित पवार गुट को वास्तविक पार्टी माना और मूल चुनाव चिन्ह उसी गुट को मिला।