गंगासागर में लापता लोगों को अपनों से मिलाने का उठाया जिम्मा, जानिए कौन हैं सनत पांडा
गंगासागर मेले में सनत पांडा पिछले 22 वर्षों से अपनों से बिछड़े तीर्थयात्रियों को मिलाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उनकी 25 उद्घोषकों की टीम, जिसम ...और पढ़ें

गुमशुदा लोगों के नामों की उद्घोषणा करते सनत पांडा (फोटो सौजन्य- बिमल कर्मकार)
HighLights
सनत पांडा 22 वर्षों से गंगासागर में सेवा दे रहे।
25 उद्घोषकों की टीम बिछड़े तीर्थयात्रियों को मिलाती है।
10 भाषाओं में घोषणाएं कर लोगों को ढूंढते हैं।
विशाल श्रेष्ठ, गंगासागर। गंगासागर में जब उनकी बुलंद आवाज गूंजती है तो अपनों से बिछड़े तीर्थयात्रियों के मन में उम्मीद जगती है कि उन पर आया संकट जल्द दूर हो जाएगा। पिछले 22 वर्षों से पर्दे के पीछे रहकर वे मकर संक्रांति पर पुण्य स्नान करने देश-दुनिया से गंगासागर आने वाले तीर्थयात्रियों की सेवा करते आ रहे हैं। उन्हें चेहरे से कोई नहीं जानता। उनकी आवाज ही उनकी पहचान है। ये शख्स हैं सनत पांडा।
गंगासागर में मुस्तैद हैं 25 उद्घोषकों की टीम
64 वर्षीय सनत 25 उद्घोषकों की टीम के साथ गंगासागर में गुम होने वाले तीर्थयात्रियों को तलाशने में दिन-रात जुटे हुए हैं। इस टीम में बंगाल सरकार के कर्मचारियों के अलावा गुमशुदा लोगों को तलाशने वाली संस्था बजरंग परिषद के सदस्य शामिल हैं।
सागर तट के ठीक सामने निर्मित विशाल टावर पर यह टीम मुस्तैद रहती है। बिछड़े लोग टावर के नीचे आकर वहां मौजूद बजरंग परिषद के सदस्यों से संपर्क करते हैं। इसके बाद एक पर्ची में उनका नाम, पता व अन्य विवरण लिखकर उसे ऊपर टावर में भिजवाया जाता है। उद्घोषकों की टीम पर्ची मिलते ही अपने काम में जुट जाती है। बिछड़े लोगों की नामों की नियमित अंतराल पर तब तक उद्घोषणा की जाती है, जब तक वे मिल नहीं जाते।
टीम में 10 भाषाओं के उद्घोषक शामिल
टीम में हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, नेपाली, ओड़िया और असमिया समेत 10 भाषाओं के उद्घोषक शामिल हैं। बंगाल सरकार के सूचना एवं संस्कृति विभाग के पूर्व कर्मचारी पांडा ने कहा-'उद्घोषकों की 8-8 घंटे की शिफ्ट होती है। मकर संक्रांति व उसके एक दिन पहले सबसे ज्यादा लोग गुम होते हैं। इन दिनों हमारी टीम को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। लगातार उद्घोषणा करनी पड़ती है। यह चुनौतीपूर्ण काम है। प्रतिदिन गुमशुदा लोगों की संख्या सैकड़ों में होती है।
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गंगासागर में हर साल गुम होते हैं हजारों तीर्थयात्री
दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर इलाके के रहने वाले सनत ने आगे कहा,'गंगासागर में हर साल हजारों तीर्थंयात्री गुम होते हैं। इनमें ज्यादातर बुजुर्ग, बीमार व शारीरिक रूप से अक्षम लोग होते हैं। उन्हें रोते-बिलखते देख बहुत तकलीफ होती है, लेकिन जब वे अपनों से मिल जाते हैं तो उनके चेहरे की खुशी देखकर मन को बड़ा आनंद मिलता है। उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। कुछ तो हमारे पैरों में पड़कर धन्यवाद देने लगते हैं।'
सनत कहते हैं, 'गंगासागर मेला एक द्वीप पर लगता है, इसलिए यहां खोने वाले अधिकांश लोग देर-सवेर मिल जाते हैं। अधिकांश लोग गुम होने के बाद हमारे टावर के पास आ जाते हैं। जो नहीं आ पाते, वे गंगासागर में एक दायरे के अंदर ही भटकते हैं इसलिए उन्हें तलाश लिया जाता है। जो तुरंत नहीं मिल पाते, उनका मेला खत्म होने के बाद स्थानीय लोगों के जरिए पता लगा लिया जाता है और उसके बाद उन्हें राज्य सरकार व बजरंग परिषद के माध्यम से घर भिजवाने की व्यवस्था की जाती है।'