ट्रंप तोड़ेंगे परंपरा... चीन के राष्ट्रपति का एयरपोर्ट पर स्वागत करने वाले बने बनेंगे पहले US प्रेसिडेंट
ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का स्वागत करने के लिए एंड्रयूज एयर फोर्स बेस जाएंगे, जो अमेरिकी राष्ट्रपति की परंपरा से हटकर होगा।

शी चिनफिंग का स्वागत करने एयरपोर्ट पर जाएंगे ट्रंप। (फाइल फोटो।)
HighLights
ट्रंप एंड्रयूज एयर फोर्स बेस पर शी चिनफिंग का स्वागत करेंगे।
बैठक में व्यापार, टैरिफ और टेक्नोलॉजी पर मुख्य चर्चा होगी।
भारत को अमेरिका-चीन के संभावित G2 बनने की चिंता है।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अमेरिकी दौरे पर जाने वाले हैं, ऐसे में यूएस प्रेसिडेंट डोनल्ड ट्रंप खुद उनका स्वागत करेंगे। ट्रंप ने सालों तक अमेरिकियों से कहा है कि चीन अमेरिका का फायदा उठा रहा है। ट्रंप ऐसी जगह जाएंगे जहां पहले कोई अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं गया।
वह वॉशिंगटन डीसी के बाहर एंड्रयूज एयर फोर्स बेस जाएंगे और चिनफिंग का तीन दिन के दौरे के लिए व्यक्तिगत रूप से स्वागत करेंगे। इस दौरान वह टैरिफ लगाने वाले कड़े नेता की छवि छोड़कर एक विनम्र स्वागतकर्ता की भूमिका में नजर आएंगे। इस नजारे पर सबकी नजर होगी।
व्हाइट हाउस में होगा भव्य औपचारिक स्वागत
चिनफिंग के एयरबेस पर स्वागत के बाद अगले दिन व्हाइट हाउस में एक भव्य औपचारिक स्वागत होगा। इसमें 479 सदस्यों वाला मिलिट्री ऑनर गार्ड, प्रेसिडेंशियल सैल्यूट, रोज गार्डन में मिलिट्री रिव्यू और चार एफ-22 रैप्टर के साथ बी-2 स्पिरिट बॉम्बर का फ्लाईओवर शामिल होगा। यह सब उस देश को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है जो शायद अब प्रभावित होने के दौर से आगे निकल चुका है।
कूटनीति के जानकार इस बात पर गौर कर रहे हैं कि विदेशी मेहमान का स्वागत करने के लिए एयरपोर्ट जाने वाले आखिरी अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और बुश थे, जो क्रमशः पोप फ्रांसिस और पोप बेनेडिक्ट का स्वागत करने के लिए एंड्रयूज एएफबी गए थे।
ट्रंप के स्वागत के लिए नहीं आए थे चिनफिंग
जब मई में ट्रंप राजकीय यात्रा पर गए थे तो शी अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए एयरपोर्ट नहीं गए थे बल्कि उन्होंने अपने उपराष्ट्रपति हान झेंग और अन्य अधिकारियों को भेजा था।
ट्रंप ने सालों तक अमेरिका की आर्थिक मुश्किलों के लिए चीन को विलेन के तौर पर पेश किया है। जैसे कि अमेरिकी नौकरियां छीनने वाला, व्यापार में हेरफेर करने वाला, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आक्रामक और उस अनुचित व्यापारिक रिश्ते का फायदा उठाने वाला जिसे उन्होंने बार-बार गलत बताया है। उन्होंने बीजिंग को झुकाने के लिए टैरिफ वॉर शुरू किया।
रेयर अर्थ्स (दुर्लभ खनिजों) के मामले में अपनी ताकत दिखाने के बाद चीन ट्रंप द्वारा अमेरिकी कॉर्पोरेट ताकत या कुछ आलोचकों की नजर में अमेरिकी कुलीनतंत्र के इस्तेमाल से भी ज्यादा प्रभावित नहीं दिखता।
इनके साथ होगी मुलाकात
जेफ बेजोस, एलन मस्क, जेन्सेन हुआंग, सैम ऑल्टमैन, टिम कुक, जेन फ्रेजर और माइकल डेल उन लोगों में शामिल हैं जो ट्रंप-चिनफिंग की बैठक में हिस्सा लेंगे। इस पावर-लिस्ट में भारतीय-अमेरिकी गूगल के सुंदर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला सबसे ऊपर हैं। खास बात यह है कि शी अपने साथ किसी भी बड़े चीनी एग्जीक्यूटिव को नहीं ला रहे हैं।
क्या होगा बैठक का एजेंडा?
बैठक के एजेंडे में ट्रेड और टैरिफ पर सबसे ज्यादा चर्चा होने की उम्मीद है। इसमें नाजुक ट्रेड समझौते को आगे बढ़ाने, दोनों तरफ से टैरिफ में संभावित कटौती, कृषि उत्पादों की खरीद और द्विपक्षीय व्यापार को मैनेज करने के तरीकों पर बातचीत हो सकती है।
नेताओं के बीच रेयर अर्थ और जरूरी मिनरल्स, सेमीकंडक्टर एक्सपोर्ट कंट्रोल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रतिबंधों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत में क्यों है चिंता?
हालांकि कोई भी पक्ष इसे जी-2 नहीं कह रहा है लेकिन यह धीरे-धीरे वैसा ही दिखने लगा है, जिससे भारत में काफी चिंता है। भारत को चीन से हटकर सप्लाई चेन में विविधता लाने की अमेरिकी कोशिशों से फायदा हुआ है।
लंबे समय से चल रहे टेक्नोलॉजी टकराव ने मैन्युफैक्चरर्स को भारत को एक वैकल्पिक प्रोडक्शन बेस के तौर पर देखने के लिए प्रेरित किया है लेकिन अमेरिका और चीन के बीच समझौता बीजिंग पर पड़ने वाले उस रणनीतिक दबाव को कुछ कम कर सकता है।
साथ ही भारतीय अधिकारियों का कहना है कि नई दिल्ली नहीं चाहती कि वॉशिंगटन और बीजिंग ताइवान, रेयर अर्थ या साउथ चाइना सी को लेकर टकराव की स्थिति में आएं। न ही वह यह चाहती है कि उसके दो सबसे बड़े बाहरी आर्थिक साझेदारों के बीच टैरिफ की लड़ाई से ग्लोबल इकॉनमी बार-बार बंधक बने।
इसलिए भारत का नजरिया बीजिंग के बजाय वाशिंगटन को चुनने का नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि उभरता हुआ जी2 एशिया पर हावी न हो जाए।
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