होर्मुज में 'मच्छर बेड़े' का खौफ: ईरान कमजोर, फिर भी हिचक रहा अमेरिका
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच करीब 40 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही ईरान की नौसेना को “लगभग खत्म'' बता रहे ...और पढ़ें

ट्रंप का दावा- ईरानी नौसेना तबाह, लेकिन संकरे जलमार्ग में जोखिम बरकरार (फोटो- रॉयटर)
HighLights
ट्रंप का दावा- ईरानी नौसेना तबाह, लेकिन संकरे जलमार्ग में जोखिम बरकरार
आईआरजीसी की गुरिल्ला समुद्री रणनीति और ड्रोन-मिसाइल खतरा बना चुनौती
न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच करीब 40 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही ईरान की नौसेना को “लगभग खत्म'' बता रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है।
रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने के लिए अमेरिका अब भी सीधा सैन्य अभियान शुरू करने से बच रहा है।
पश्चिम एशिया में भारी सैन्य जमावड़े- मरीन कमांडो, एंफीबियस युद्धपोत और उन्नत वायुसेना- के बावजूद अमेरिकी नौसेना इस संकरे जलमार्ग में सीधे टकराव से हिचक रही है। इसकी बड़ी वजह ईरान की तथाकथित “मच्छर बेड़ा'' रणनीति है, जो छोटे, तेज और फुर्तीले हमलावर नौकाओं पर आधारित है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) की नौसेना पारंपरिक युद्ध के बजाय गुरिल्ला शैली में काम करती है। बड़े युद्धपोतों के बजाय यह छोटे हमलावर बोट, ड्रोन और तटीय मिसाइल ठिकानों के जरिए “हिट-एंड-रन'' रणनीति अपनाती है। यही कारण है कि भारी नुकसान के बावजूद ईरान अब भी समुद्री मार्गों के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय समुद्री एजेंसी के अनुसार, युद्ध के दौरान कम से कम 20 जहाजों पर हमले हुए। इन हमलों में ज्यादातर ड्रोन और मोबाइल लांचरों से दागी गई मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ, जिनका पता लगाना मुश्किल होता है।
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अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का दावा है कि ईरान की नियमित नौसेना का 90 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है, जबकि आइआरजीसी की कई तेज हमले करने वाली नौकाएं भी डूब गई हैं।
इसके बावजूद इन छोटी नौकाओं की वास्तविक संख्या का आकलन मुश्किल है, क्योंकि ये अक्सर गुफाओं और छिपे ठिकानों में तैनात रहती हैं और मिनटों में तैनाती के लिए तैयार हो जाती हैं।
वाशिंगटन इंस्टीट्यूट में गार्ड नेवी के विशेषज्ञ फारजीन नादिमी कहते हैं कि ईरान की गार्ड नौसेना में करीब 50,000 सैनिक हैं। इनको खाड़ी के किनारे पांच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, जिनको ईरान के नियंत्रण वाले 38 खाड़ी द्वीपों में से कई टापुओं पर तैनात किया गया है।
हमलावर नौकाओं के लिए लगभग 10 किलेबंद अड्डे बनाए गए हैं। ये सभी नौसेना के विशेष बलों के संचालन केंद्र- फरूर- से संचालित होते हैं। यहां मौजूद उपकरणों के बारे में कहा जाता है कि ये अमेरिका के स्तर के उन्नत मॉडल पर आधारित हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि होर्मुज जैसे संकरे जलमार्ग में यही असमान युद्ध (एसिमेट्रिक वॉरफेयर) अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यहां बड़े युद्धपोतों की गति और संचालन सीमित हो जाता है, जबकि छोटे हमलावर बोट, ड्रोन और तटीय मिसाइलें अचानक हमला कर सकती हैं।
इसी खतरे को देखते हुए अमेरिकी नौसेना फिलहाल होर्मुज के भीतर गश्त करने से बच रही है और ओमान की खाड़ी या अरब सागर जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों से निगरानी कर रही है।
यहां से वह जहाजों की गतिविधियों पर नजर रख सकती है, लेकिन सीधे हमले के जोखिम को कम करती है। दूसरी ओर, ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि दबाव बढ़ा तो वह यमन स्थित अपने सहयोगियों के जरिए लाल सागर तक संघर्ष का दायरा बढ़ा सकता है।