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'वे जंगल गए हैं', नेपाल में 12 साल का बच्चा अभी भी कर रहा माता-पिता का इंतजार; त्रासदी में चली गई दोनों की जान

Published: Tue, 08 Sep 2026 11:17 AM (IST)

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने 12 वर्षीय त्सेरिंग के माता-पिता को छीन लिया, लेकिन उसे यह बात नहीं बताई ...और पढ़ें

माता-पिता के इंतजार में 12  साल का त्सेरिंग।

माता-पिता के इंतजार में 12 साल का त्सेरिंग।

HighLights

  1. नेपाल बाढ़ में 12 वर्षीय त्सेरिंग ने माता-पिता खोए।

  2. उसे बताया गया माता-पिता जंगल गए, लौटने में समय लगेगा।

  3. रसुवा के 520 लोग काठमांडू के मठ में विस्थापित।

डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल में आई जल प्रलय ने तमाम जिंदगियां तबाह कर दीं। इन्हीं में से एक 12 साल का त्सेरिंग भी है। वह अपनी बड़ी बुआ और अपनी दादी के साथ रह रहा है लेकिन उसे वह बात नहीं पता जो बाकी लोग जानते हैं। वह उन सैकड़ों लोगों में से एक है जो 26 अगस्त को रसुवा में अचानक आई बाढ़ से अपने इलाके उजड़ जाने के बाद विस्थापित हो गए थे।

यह आपदा तब आई जब नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर की बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नदी की घाटी में तेजी से नीचे आया। इस आपदा में अकेले नेपाल में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, हजारों लोग अभी भी लापता हैं और पूरी की पूरी बस्तियां नक्शे से मिट गई हैं।

शायद कभी वापस नहीं आएंगे त्सेरिंग के मां-बाप

त्सेरिंग की मां का नाम कम्मी था और पिता का नाम फुरसांग। वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन त्सेरिंग को यह बात नहीं बताई गई है। इसके बजाय, उसकी देखभाल करने वाले बड़ों ने उससे कहा है कि उसके माता-पिता जंगल में कहीं गए हैं। उनका कहना है कि रास्ते खराब हो गए हैं और उन्हें वापस आने में एक-दो साल लग सकते हैं। त्सेरिंग उनकी बात मान लेता है।

कभी-कभी, जब वह अपने आस-पास के बड़ों को रोते हुए देखता है तो पूछता है कि वे क्यों रो रहे हैं और कभी-कभी वह खुद भी रोने लगता है। जब वह अपने माता-पिता के बारे में पूछता है तो उसे बताया जाता है कि वे जंगल में गए हैं और अभी उन तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है।

उसकी बुआ को यह बात पता है। वह कहती हैं, "उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे।" लेकिन त्सेरिंग को यह बात नहीं पता। फिलहाल, वह अभी भी उनके घर लौटने का इंतजार कर रहा है।

520 लोगों का दुख समेटे एक मठ

रासुवा के लगभग 520 लोग अब काठमांडू के एक मठ में रह रहे हैं। वे तब यहां आए जब बाढ़ ने उनके घरों और बस्तियों को तबाह कर दिया और सड़कों व पुलों को नुकसान पहुंचाया। यहां के दुख से बच पाना मुश्किल है। यह दुख हादसे से बचे लोगों की बातचीत में साथ बैठे बुज़ुर्गों में और अपने बच्चों पर नजर रखने वाले माता-पिता में झलकता है। जब कोई कुछ नहीं भी बोल रहा होता, तब भी जो कुछ खो गया है और जो जिंदगी पीछे छूट गई है, इसका एहसास बना रहता है।

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