Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    इबोला का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन कितना है खतरनाक? 139 मौतों के बाद WHO ने घोषित की हेल्थ इमरजेंसी

    Updated: Wed, 20 May 2026 05:20 PM (IST)

    अफ्रीकी देशों कांगो और युगांडा में इबोला के बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के प्रकोप के बाद WHO ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। इस दुर्लभ स ...और पढ़ें

    इबोला का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन कितना खतरनाक। (रॉयटर्स)

    इबोला का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन कितना खतरनाक। (रॉयटर्स)

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस का नया प्रकोप तेजी से फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बुधवार को इसे अंतरराष्ट्रीय चिंता की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित कर दिया। हालांकि WHO का कहना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम अभी कम है, लेकिन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति गंभीर बनी हुई है।

    इस बार संक्रमण के पीछे इबोला का दुर्लभ 'बुंडीबुग्यो स्ट्रेन' (Bundibugyo strain) पाया गया है, जिसके लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है।

    अब तक कितने लोग प्रभावित?

    WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस के अनुसार,कम से कम 139 मौतें इस प्रकोप से जुड़ी मानी जा रही हैं। लगभग 600 संदिग्ध मामले सामने आए हैं और अब तक 51 मामलों की आधिकारिक पुष्टि हुई है।

    WHO ने स्वीकार किया कि संक्रमण के वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं। संगठन की डीआरसी प्रतिनिधि डॉ. ऐनी अंसिया ने कहा कि वायरस कितनी दूर तक फैल चुका है, इसे लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है।

    अमेरिका भी अलर्ट पर

    इस प्रकोप का असर अब अमेरिका तक पहुंच गया है। डीआरसी में काम कर रहे एक अमेरिकी डॉक्टर इबोला संक्रमित पाए गए हैं। अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र ने पुष्टि की कि संक्रमित व्यक्ति को इलाज के लिए जर्मनी भेजा जा रहा है।

    संक्रमित डॉक्टर की पहचान डॉ. पीटर स्टैफर्ड के रूप में हुई है, जो बर्न केयर एक्सपर्ट हैं और डीआरसी के बुनिया शहर में मरीजों की सहायता कर रहे थे।

    CDC ने बताया कि संक्रमित अमेरिकी के छह हाई-रिस्क कॉन्टैक्ट्स को भी यूरोप ले जाया जा रहा है। इनमें से पांच को जर्मनी और एक को चेक गणराज्य भेजा जाएगा। दो अन्य डॉक्टरों के संपर्क में आने की आशंका है, लेकिन उनमें अभी लक्षण नहीं मिले हैं।

    खबरें और भी

    कैसे फैलता है इबोला?

    इबोला संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों जैसे, खून, उल्टी, मल, संक्रमित सतहों या वस्तुओं के सीधे संपर्क से फैलता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, संक्रमित व्यक्ति में लक्षण आने के बाद ही संक्रमण फैलने की संभावना अधिक होती है। वायरस का ऊष्मायन काल 2 से 21 दिनों तक हो सकता है।

    युगांडा तक पहुंचा संक्रमण

    युगांडा में भी दो पुष्ट मामले सामने आए हैं। वहां के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, पहला मरीज डीआरसी से आया था और बाद में उसकी मौत हो गई। दूसरा मामला भी डीआरसी से जुड़ा आयातित संक्रमण माना जा रहा है। युगांडा ने सीमा निगरानी, स्क्रीनिंग और आपात प्रतिक्रिया व्यवस्था सक्रिय कर दी है।

    प्रकोप की शुरुआत कैसे हुई?

    WHO के अनुसार, 5 मई को डीआरसी के इतुरी प्रांत के मोंगबवालू इलाके से रहस्यमयी बीमारी की सूचना मिली थी। यहां चार स्वास्थ्यकर्मियों की चार दिनों के भीतर मौत हो गई थी। जांच में पता चला कि पहला संक्रमित स्वास्थ्यकर्मी 24 अप्रैल को बुनिया अस्पताल पहुंचा था।

    उसमें तेज बुखार, उल्टी, अत्यधिक कमजोरी जैसे सामान्य लक्षण थे। शुरुआती जांच में इबोला के सबसे आम 'जायरे स्ट्रेन' की रिपोर्ट निगेटिव आई थी। बाद में किंशासा भेजे गए सैंपल में बुंडीबुग्यो स्ट्रेन की पुष्टि हुई। इस देरी के कारण संक्रमण तेजी से फैल गया।

    अंतिम संस्कार बना संक्रमण का बड़ा कारण

    WHO के मुताबिक, मृत स्वास्थ्यकर्मी के अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में लोग संपर्क में आए। स्थानीय परंपरा के अनुसार लोग शव को छूते हैं, नहलाते हैं और कपड़े पहनाते हैं। पहले शव को ताबूत में रखा गया था, लेकिन बाद में परिवार ने पारंपरिक कपड़े में लपेटकर अंतिम संस्कार किया। इसी दौरान बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हुए।

    डॉ. ऐनी अंसिया ने कहा कि यहीं से संक्रमण तेजी से फैलना शुरू हुआ।

    बुंडीबुग्यो स्ट्रेन क्यों अलग है?

    इबोला वायरस की 6 ज्ञात प्रजातियों में से तीन बड़े प्रकोप का कारण बनी हैं। बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पहली बार 2007 में युगांडा में पहचाना गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्ट्रेन अन्य प्रकारों की तुलना में धीमी गति से बढ़ता है। इसकी मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम हो सकती है, लेकिन वायरस शरीर में लंबे समय तक बना रह सकता है। 2007 के प्रकोप में इसकी मृत्यु दर करीब 32% थी।

    कोई वैक्सीन नहीं, इलाज भी सीमित

    सबसे बड़ी चिंता यह है कि बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए अभी कोई स्वीकृत वैक्सीन नहीं है। कोई विशेष एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। WHO के वैज्ञानिक वासे मूर्ति ने कहा कि इस स्ट्रेन के लिए वैक्सीन विकसित करने में कई महीने लग सकते हैं।

    फिलहाल मरीजों को-डिहाइड्रेशन से बचाव, ऑक्सीजन सपोर्ट, ब्लड प्रेशर नियंत्रण, पोषण और दर्द प्रबंधन जैसी सहायक चिकित्सा दी जा रही है।

    अमेरिका ने लगाए यात्रा प्रतिबंध

    संक्रमण के खतरे को देखते हुए अमेरिका ने डीआरसी, युगांडा, कांगो और दक्षिण सूडान से आने वाले गैर-अमेरिकी नागरिकों पर 21 दिनों का प्रवेश प्रतिबंध लगाया है। डीआरसी के इतुरी प्रांत को 'लेवल-4: डू नॉट ट्रैवल' श्रेणी में रखा है।

    व्हाइट हाउस की डिप्टी डायरेक्टर हेइडी ओवरटन ने कहा, "अभी अमेरिका में इबोला का कोई मामला नहीं है और हम इसे ऐसा ही बनाए रखना चाहते है।"

    पहले भी तबाही मचा चुका है इबोला

    इबोला की पहचान पहली बार 1976 में हुई थी। माना जाता है कि यह वायरस चमगादड़ों और जंगली जानवरों से इंसानों में आया। सबसे बड़ा प्रकोप 2014-16 के दौरान पश्चिम अफ्रीका में हुआ था, जिसमें, 28,600 से अधिक मामले सामने आए और 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।

    डीआरसी में 2018-20 के बीच भी बड़ा प्रकोप हुआ था, जिसमें 2,299 लोगों की जान गई थी। डीआरसी में 1976 के बाद यह इबोला का 17वां आधिकारिक प्रकोप है।

    यह भी पढ़ें- इबोला वायरस को लेकर भारत में अलर्ट, स्वास्थ्य मंत्रालय ने बढ़ाई निगरानी