ग्लेशियर झील से आई नेपाल की बाढ़ या कुछ और है वजह? कम बारिश में क्यों बेकाबू हो रही हिमालयी नदियां
नेपाल की त्रासदी हिमालय में बदलते मौसम के बड़े खतरे का संकेत है, जहां कुल बारिश कम होने के बावजूद ...और पढ़ें

बढ़ते तापमान से ग्लेशियर पिघल रहे, नदियों का प्रवाह बदल रहा

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। नेपाल की त्रासदी को केवल ग्लेशियर से जुड़ी घटना मानना सही नहीं होगा। यह हिमालय में बदलते मौसम के एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है।
अब कई जगहों पर कुल बारिश कम हो रही है, लेकिन जब बारिश होती है तो बहुत कम समय में अत्यधिक हो जाती है। इससे भूस्खलन, नदियों में अचानक बाढ़ और मलबे के तेज बहाव जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
कम बारिश में क्यों बेकाबू हो रही हैं हिमालयी नदियां?
जाहिर है, हिमालय का नया खतरा बारिश की कुल मात्रा से ज्यादा उसके अचानक और तीव्र रूप में सामने आ रहा है। तेज बारिश के बाद भूस्खलन से नदी का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इसके पीछे पानी जमा होता रहता है और प्राकृतिक अवरोध टूटने पर पानी पत्थर और मलबे के साथ तेजी से नीचे आता है। यानी एक घटना दूसरी आपदा को जन्म देने लगी है। इसका असर पहाड़ से लेकर तराई और मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचने लगा है।
इसी बदलते खतरे को भांपते हुए भारत मौसम विभाग (आईएमडी) की ओर से हाइपर-लोकल पूर्वानुमान पर जोर दिया जा रहा है। रडार, उपग्रह, स्वचालित मौसम केंद्र और एआई की मदद से छोटे क्षेत्रों के लिए अधिक सटीक चेतावनी देने की जरूरत बढ़ गई है। केवल कुल बारिश का आंकड़ा देखकर किसी क्षेत्र में आपदा के खतरे का आकलन अब पर्याप्त नहीं है।
क्या कहते हैं मौसम विशेषज्ञ?
स्काईमेट के ताजा आकलन में भी इस बदलाव को समझाया गया है। उसने 2026 के पूरे मानसून में देश में सामान्य के केवल 85 प्रतिशत बारिश का अनुमान लगाया है। सितंबर में भी 80 प्रतिशत बारिश का अनुमान है। इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में तेज बारिश के दौर आने की आशंका है।
यानी देश की कुल बारिश कम हो, तब भी किसी पहाड़ी इलाके में अचानक अत्यधिक पानी गिर सकता है। मौसम विशेषज्ञ महेश पलावत के अनुसार बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ रही है। हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से बर्फ और ग्लेशियरों के साथ पहाड़ों की प्राकृतिक स्थिरता भी प्रभावित होने लगी है।
दो दशक में बढ़ा हिमलय का तापमान
आईआईटी खड़गपुर की रिपोर्ट में भी तापमान बढ़ने के संकेत मिले हैं। पिछले दो दशकों में हिमाचल के कई क्षेत्रों के तापमान में करीब एक डिग्री तक वृद्धि हुई है। अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से जारी रही तो अगले 70 वर्षों में हिमालय-काराकोरम क्षेत्र की करीब 65 प्रतिशत बर्फ पिघल सकती है। इससे नदियों में पानी की मात्रा और उसके प्रवाह का स्वरूप भी बदल सकता है।
अरुणाचल प्रदेश में सितंबर 2020 की अत्यधिक बारिश का अध्ययन भी इसी खतरे को रेखांकित करता है। लगातार बारिश से पहाड़ की ढलानें कमजोर हुईं और इसके बाद एक दिन में 170 मिलीमीटर से अधिक बारिश ने बड़े पैमाने पर भूस्खलन कराया। मलबे ने कई जगह नदियों का रास्ता रोका और अवरोध टूटने पर बाढ़ का पानी असम के धेमाजी तक पहुंच गया।
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र के इस वर्ष के आकलन में भी हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में इसी खतरे की ओर ध्यान दिलाया गया है। सामान्य से कम मानसूनी बारिश का मतलब यह नहीं है कि आपदा का खतरा भी कम हो गया। बारिश कुछ सीमित क्षेत्रों में बहुत अधिक मात्रा में और बहुत कम समय में हो सकती है।
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