क्या खत्म हो गया ब्रिटेन का 'साम्राज्य'? 10 साल में बदले 7 PM; ब्रेक्जिट और आर्थिक संकट ने कैसे बदली UK की तस्वीर?
कभी दुनिया पर राज करने वाला ब्रिटेन आज खुद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और मंदी के खतरों के बीच आखिर क्यों दुनिया क ...और पढ़ें

जिस देश का सूरज कभी नहीं डूबता था, वहां 10 साल में आए 7 पीएम। यह फोटो एआई से बनवाई गई है।
HighLights
एक दशक में ब्रिटेन ने बदले सात प्रधानमंत्री।
ब्रेक्जिट से जीडीपी और निवेश में बड़ी गिरावट।
ब्रिटेन की वैश्विक शक्ति और प्रभाव में कमी।
डिजिटल टीम, लंदन। 'ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता...', यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि कभी विश्व की सबसे बड़ी ताकत की पहचान थी। दुनिया के नक्शे के बड़े हिस्से पर महारानी का एकक्षत्र राज रहा। आज उसी ब्रिटेन में हालात ऐसे है कि महज एक दशक के भीतर सातवें प्रधानमंत्री की तलाश चल रही है। ब्रिटेन में राजनीतिक संकट, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और बार-बार बदलते नेतृत्व ने नई बहस छेड़ दी है।
क्या ब्रिटेन का सूरज ढलने की ओर है या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी संकट है? आखिर पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन में ऐसा क्या हुआ कि दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल यह देश लगातार संकटों से घिर गया? आइए हम आपको बताते हैं...
महाशक्ति से संघर्षरत देश कैसे बना?
19वीं सदी में ब्रिटेन का प्रभुत्व था। दुनिया की करीब 25 फीसदी जमीन और 20 फीसदी आबादी पर उसका नियंत्रण था। उस वक्त डॉलर नहीं, ब्रिटिश पाउंड वैश्विक रिजर्व मुद्रा हुआ करती थी। औद्योगिक क्रांति, रेलवे, भाप के इंजन और आधुनिक वैश्विक व्यापार की शुरुआत भी ब्रिटेन से ही हुई थी।
हालांकि, यह ब्रिटेन का पक्ष है, जबकि इसके इतर इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी है कि ब्रिटेन का साम्राज्य उपनिवेशवाद, शोषण और संसाधनों की लूट पर खड़ा था। भारत, अफ्रीका और कैरेबियन के देशों से प्राप्त संसाधनों ने ब्रिटेन की समृद्धि को मजबूत किया।
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ब्रिटेन की समृद्धि में गिरावट कब शुरू हुई?
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यानी 1945 के बाद ब्रिटेन का वैश्विक दबदबा कमजोर पड़ता नजर आने लगा था। दूसरी ओर अमेरिका नई महाशक्ति बनकर उभर रहा है, लेकिन साल 1965 का स्वेज संकट निर्णायक साबित हुआ। मिस्र द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई की, लेकिन अमेरिकी दबाव के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा।
इतिहासकारों की मानें तो पता चलता है - स्वेज संकट से स्पष्ट हो गया था कि ब्रिटेन अब स्वतंत्र रूप से वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन करने की स्थिति में नहीं रहा।
ब्रेक्जिट ने बढ़ाईं आर्थिक मुश्किलें
बात 23 जून 2016 की है। उस वक्त ब्रिटेन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन थे। 23 जून को ब्रिटेन यूरोपीय संघ (European Union-EU) से बाहर निकलने या बने रहने को लेकर जनमत संग्रह कराया गया। 51.9% लोगों ने EU छोड़ने यानी ब्रेक्जिट (Brexit) के पक्ष में वोट किया था। जबकि 48.1% लोगों ने ईयू में बने रहने का समर्थन किया।
डेविड कैमरन यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष थे, लेकिन जनमत संग्रह में जनता ने EU छोड़ने का फैसला किया, तो उन्होंने इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए 24 जून 2016 को इस्तीफे की घोषणा कर दी।
ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया। विभिन्न आर्थिक अध्ययनों के अनुसार, ब्रेक्जिट के बाद देश की जीडीपी में 6 से 8 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। निवेश में 12 से 13 प्रतिशत की कमी आई, जबकि उत्पादकता और रोजगार पर भी नकारात्मक असर पड़ा।
विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से ब्रिटेन को हर साल अरबों पाउंड का आर्थिक नुकसान हो रहा है। पिछले दो दशकों में ब्रिटिश नागरिकों की आय वृद्धि भी ऐतिहासिक रूप से सबसे धीमी रही है।
बार-बार प्रधानमंत्री का बदलना भी एक कारण
मौजूदा वक्त में ब्रिटेन में राजनीतिक अस्थिरता भी चिंता का सबसे बड़ा कारण है। साल 1979 से 2016 तक करीब 37 सालों में देश ने केवल पांच प्रधानमंत्री देखे थे, लेकिन 2016 के बाद से केवल 10 साल के भीतर छह प्रधानमंत्री बदल चुके हैं और सातवें की तलाश जारी है।
बोरिस जॉनसन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। लिज ट्रस केवल 45 दिन तक प्रधानमंत्री रहीं, जबकि ऋषि सुनक भी दो वर्ष से कम समय में पद छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बदलता नेतृत्व जनता के घटते भरोसे और आर्थिक असंतोष का संकेत है।
प्रधानमंत्री | पार्टी | कार्यकाल | कुल समय |
कीर स्टार्मर | लेबर | 5 जुलाई 2024 – 22 जून को इस्तीफा | 1 वर्ष 11 माह |
ऋषि सुनक | कंजर्वेटिव | 25 अक्टूबर 2022 – 5 जुलाई 2024 | 1 वर्ष 8 माह 10 दिन |
लिज ट्रस | कंजर्वेटिव | 6 सितंबर 2022 – 25 अक्टूबर 2022 | 49 दिन |
बोरिस जॉनसन | कंजर्वेटिव | 24 जुलाई 2019 – 6 सितंबर 2022 | 3 वर्ष 1 माह 13 दिन |
थेरेसा मे | कंजर्वेटिव | 13 जुलाई 2016 – 24 जुलाई 2019 | 3 वर्ष 11 दिन |
डेविड कैमरन | कंजर्वेटिव | 11 मई 2010 – 13 जुलाई 2016 | 6 वर्ष 2 माह 2 दिन |
अभी कितना ताकतवर है ब्रिटेन?
यूं तो ब्रिटेन कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन वैश्विक प्रभाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और वीटो शक्ति रखता है। ब्रिटेन आज भी दुनिया की प्रमुख सैन्य और कूटनीतिक शक्तियों में शामिल है।
इसके अलावा उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी 'सॉफ्ट पावर' मानी जाती है। ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और मैनचेस्टर जैसी विश्वस्तरीय यूनिवर्सिटियां आज भी वैश्विक नेतृत्व तैयार कर रही हैं। लंदन दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय केंद्रों में शामिल है और ब्रिटेन वैश्विक नवाचार तथा तकनीकी क्षेत्र में भी अग्रणी देशों में गिना जाता है।
ब्रिटेन में वास्तिवक समस्या क्या है?
विदेश नीति के जानकार बताते हैं कि ब्रिटेन की मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता केवल सरकारों के बदलने की कहानी नहीं है। इसकी असली वजह लंबे समय से चली आ रही आर्थिक सुस्ती, बढ़ती क्षेत्रीय व सामाजिक असमानता और मुख्यधारा की राजनीति पर घटता जनविश्वास है।
हालांकि कुछ विश्लेषकों का अलग मानना है। वह कहते हैं कि ब्रिटेन अभी तक अपने साम्राज्यवादी अतीत की मानसिकता से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है। ब्रेक्जिट को भी इसी सोच का परिणाम माना जाता है, जबकि इसी भावना के सहारे नाइजेल फराज जैसे नेता राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या ब्रिटेन चुनौतियों से उबर पाएगा?
इतिहास पर नजर डाले तो पता चलता है कि पूर्व में कई देशों ने बड़े संकटों के बाद खुद को दोबारा न सिर्फ स्थापित किया है, बल्कि महाशक्तियों में शुमार भी हुए।
- फ्रांस ने साल 1950 के दशक की राजनीतिक अस्थिरता से उबरकर नई व्यवस्था बनाई।
- जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद खुद को पुनर्गठित किया।
- जर्मनी ने युद्ध के मलबे से उठकर दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में जगह बनाई।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ब्रिटेन भी अपने आर्थिक और राजनीतिक संकट से निकलकर खुद को नए दौर के अनुरूप फिर से मजबूत बना पाएगा, या उसका वैश्विक प्रभाव धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।