अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी अब उन्हीं के देश के बच्चे पढ़ेंगे, पंचकोट राजपरिवार का इतिहास पहुंचा ब्रिटिश लाइब्रेरी
बंगाल के पंचकोट राजपरिवार का अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध का इतिहास अब ब्रिटिश लाइब्रेरी में शामिल हो गया है। सूर्य नारायण सिंह देव द्वारा लिखित पुस्तक ...और पढ़ें

एआई से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
पंचकोट राजपरिवार का इतिहास ब्रिटिश लाइब्रेरी में शामिल।
ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों का वर्णन पुस्तक में।
राजपरिवार और प्रजा का अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल के पुरुलिया के पंचकोट राजपरिवार का इतिहास ब्रिटिश लाइब्रेरी में पहुंच गया है। ईस्ट इंडिया कंपनी के पंचकोट पर दबाव बनाने, उसकी नीलामी करने, लगान वसूलने के लिए बल प्रयोग करने और प्रजा के प्रतिरोध की कहानी अब अंग्रेजों के बच्चे भी पढ़ेंगे।
पंचकोट राजपरिवार के इतिहास और अंग्रेजी शासन के दौर की अनकही घटनाओं को समेट ने वाली पुस्तक ‘फुटप्रिंट्स आफ पंचकोट परमार डायनेस्टी आफ बंगाल’ को ब्रिटिश लाइब्रेरी में स्थान मिला है।
20 वर्षों के तथ्यों के साथ तैयार हुआ किताब
13 अध्यायों वाली इस पुस्तक को पंचकोट राजपरिवार के वंशज और केंद्रीय रेशम बोर्ड के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक सूर्य नारायण सिंह देव ने करीब 20 वर्षों तक तथ्य जुटाकर लिखा है। इसे लिखने में उन्हें छह वर्ष लगे। 103 पृष्ठों वाली यह पुस्तक पंचकोट साम्राज्य के इतिहास, राजपरिवार के संघर्ष और अंग्रेजी शासन के दौर में हुए घटनाक्रमों का दस्तावेज है। पुस्तक में जुलाई, 1798 की एक घटना को प्रमुखता से दर्ज किया गया है। उस समय भरतशेखर सिंह देव पंचकोट के राजा थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने नीलाम कर दिया था 86 मौजें
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंचकोट की 86 मौजों को नीलाम कर दिया था, हालांकि वहां की प्रजा ने लगान देने से इन्कार कर दिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बल प्रयोग कर लगान वसूलने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाई। अंततः कंपनी को नीलामी रद कर संपत्ति राजा को वापस करनी पड़ी। ब्रिटिश भारत के शासन में इसे दुर्लभ घटनाओं में गिना जाता है।
बालक नीलमणि को मारी गई थी गोली
राजपरिवार के भीतर सत्ता संघर्ष की एक घटना भी पुस्तक में दर्ज है। राजा नीलमणि सिंह देव जब केवल नौ वर्ष के थे और महल के बगीचे में खेल रहे थे, तभी उन्हें निशाना बनाकर गोली चलाई गई। गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके बाद उनकी मां और ओडिशा के क्योंझर की राजकुमारी विदूषी महिला ने बेटे की सुरक्षा के लिए काशीपुर में गुप्त रूप से महल बनवाया और उन्हें लेकर वहां चली गईं।
खबरें और भी
पंचकोट राजप्रासाद के ज्योति विलास में हीरे, पन्ने, माणिक, नीलम, पुखराज और सोने समेत करोड़ों रुपये मूल्य की प्राचीन संपत्तियों का भी उल्लेख पुस्तक में है। राजाओं के शिकार से जुड़ी निशानियों में रायल बंगाल टाइगर, तेंदुए, हाथी के पैर, जंगली भैंसे के सिर और बारहसिंगा का विवरण है।
गलत धारणाओं को दूर करने की कोशिश
सूर्य नारायण सिंह देव ने बताया कि राजपुरोहित राखाल चक्रवर्ती और लोकसंस्कृति शोधकर्ता दिलीप गोस्वामी ने पंचकोट के इतिहास पर काम किया है, लेकिन राजवंश की कई अनकही घटनाएं अब तक सामने नहीं आई थीं। इतिहास को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं भी प्रचारित हुईं। एक फिल्म में पंचकोट के राजाओं पर नरबलि देने का चित्रण किया गया था।
इसलिए राजपरिवार ने दस्तावेजों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपना इतिहास सामने रखने का निर्णय लिया। उन्होंने आगे कहा कि पंचकोट राजपरिवार का रुख हमेशा अंग्रेज विरोधी रहा। पुस्तक में अंग्रेजी शासन के दौर में राजपरिवार और प्रजा के प्रतिरोध का उल्लेख किया गया है। ऐसे इतिहास को ब्रिटिश लाइब्रेरी में जगह मिलना राजपरिवार के लिए गर्व का विषय है।
डेढ़ महीने की प्रक्रिया के बाद ब्रिटिश लाइब्रेरी में स्थान
पुस्तक को ब्रिटिश लाइब्रेरी तक पहुंचाने के लिए पहले विदेशी पुस्तकों से संबंधित प्रक्रिया की जानकारी जुटाई गई। ई-मेल के माध्यम से पुस्तक की जानकारी और आवेदन भेजा गया। इसके बाद लाइब्रेरी के निर्देश पर पुस्तक का सारांश भेजा गया। संबंधित समिति ने सामग्री और विवरणों पर विचार करने के बाद स्वीकृति दी। करीब डेढ़ महीने की प्रक्रिया के बाद हाल में पुस्तक को ब्रिटिश लाइब्रेरी के संग्रह में स्थान मिला।