यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 09, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
किताब में दावा, नरसिम्हा राव-सोनिया के बीच रिश्ते नहीं थे सहज
कांग्रेस में वंशवाद हमेशा से हावी रहा है। नरसिम्हा राव कांग्रेस की तरफ से पहले गैर गांधी पीएम बने। एक किताब के मुताबिक वो सोनिया गांधी को दरकिनार करने में जुटे थे।

नई दिल्ली। भूतपूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे नरसिम्हा राव को भारतीय राजनीति में चाणक्य के तौर पर जाना जाता है। कांग्रेस की राजनीति में जहां उनके बहुत से शुभचिंतक थे वहीं उनके धुर विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी। कांग्रेस और देश की राजनीति के बारे में उन्होंने अपने किताब इनसाइडर में बहुत से खुलासे किए थे। नरसिम्हा राव इनसाइडर की सीक्वेल भी लिख रहे थे। लेकिन किताब लिखने के दौरान ही उनकी मौत हो गयी। हालांकि उनके किताब को पूरा करने में विनय सीतापति नाम के शख्स जुटे हैं। अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक जुलाई में किताब को रिलीज किया जाएगा। किताब में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे हालात, राजीव सोनिया गांधी से बनते बिगड़ते रिश्तों और बाबरी मस्जिद विध्वंस का भी जिक्र किया गया है।
राव और सोनिया के रिश्ते
किताब में सोनिया गांधी के साथ खट्टे मीठे रिश्तों का भी जिक्र किया गया है। किताब के मुताबिक 1993 के बाद सोनिया गांधी और राव के रिश्तों में खटास बढ़ती जा रही थी। नरसिम्हा राव को ये लगने लगा था कि सोनिया गांधी उन्हें पीएम पद से हटाना चाहती हैं। 1993 के बाद सोनिया गांधी ने अर्जुन सिंह और एन डी तिवारी पर ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया था। किताब में इस बात का जिक्र किया गया है कि सोनिया गांधी को नरसिम्हा राव ने हाशिए पर रखने की कोशिश कर रहे थे।
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राव पर नहीं था भरोसा
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली की सड़कों पर सिखों का कत्लेआम किया जा रहा था। उस समय राजीव गांधी सरकार में नरसिम्हा राव गृहमंत्री थे। किताब के मुताबिक कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नरसिम्हा राव को बताया कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर से लेकर एसएचओ तक अब गृहमंत्री की जगह सीधे पीएमओ को रिपोर्ट करेंगे। इसके पीछे जो वजह बताई गयी वो ये थी कि दिल्ली की सड़कों पर हिंसा पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकेगा। वहीं दूसरी वजह ये थी कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली की सड़कों पर पुलिस फोर्स उतनी मुस्तैदी से काम न कर सके जितनी सिख विरोधी हिंसा को रोकने के लिए जरूरी था। किताब के मुताबिक राव पर ये आरोप है कि उन्होंने सिख विरोधी हिंसा को रोकने की जगह विदेशी मेहमानों के आवभगत में लगे रहे। उन्होंने संविधान की जगह अपनी पार्टी के आवाज को तवज्जों दी।
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बाबरी विध्वंस और राव की नीति
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राव सभी मुश्किलों का सामना करने के बाद मजबूत स्थिति में आ चुके थे। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के एक दिन बाद उन्होंने कहा कि वो मस्जिद को दोबारा बनवाएंगे। हालांकि उनके इस बयान का कैबिनेट के कुछ सदस्यों ने विरोध किया । राव के अप्वाइंटमेंट डायरी से पता चलता है कि बाबरी मस्जिद को गिराने के दिन एस्ट्रोलॉजर एन के शर्मा मौजूद थे। राव ने कैबिनेट मीटिंग बुलाने में देरी की उसके पीछे वजह ये नहीं थी कि कारसेवकों को उनके काम से रोका जाए बल्कि वो कल्याण सिंह सरकार की बर्खास्तगी में अपने धुर विरोधी अर्जुन सिंह को भागीदार बनाना चाहते थे।
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किताब में इस बात का भी जिक्र है कि राव कांग्रेस के पहले गैर गांधी पीएम थे। वो गांधी परिवार के आभामंडल से निकलने की कोशिश करते रहे। लेकिन कामयाब नहीं हो सके। पीएम पद से हटने के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें एक तरह से अकेला कर दिया। सिर्फ मनमोहन सिंह ही एक ऐसे शख्स थे जो नरसिम्ह राव का आदर करते थे।

