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    E85 फ्यूल क्या है और कैसे काम करती हैं फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां? जानें फायदे और बड़ी चुनौतियां

    Updated: Wed, 10 Jun 2026 01:05 PM (IST)

    इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की लोकप्रियता बढ़ रही है, पर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने और स्वच्छ यातायात सुनिश्चित करने में फ्लेक्स फ्यूल कहीं अधिक व्य ...और पढ़ें

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के मौके पर दिल्ली में ई85 फ्यूल की शुरुआत की गई। इसके बाद कुछ ऑटो कंपनियों द्वारा एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों को पेश किया गया, जिसकी काफी चर्चा हो रही है। फिलहाल, E85 फ्यूल को 48 आउटलेट्स पर लॉन्च किया गया है और दिसंबर 2026 तक इसे 500 आउटलेट्स और दिसंबर 2027 तक 5,000 आउटलेट्स तक बढ़ाने की योजना है।

    भारत आधिकारिक तौर पर अब E85 ईंधन के दौर में प्रवेश कर रहा है, इससे आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता और वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण पर काफी हद तक लगाम लगेगी, जिसके स्थायी समाधान के लिए दशकों से कवायद हो रही है। हालांकि, उत्साह के इस माहौल में ग्राहकों के मन एक स्वाभाविक सवाल आ सकता है कि क्या E85 वाहनों को आज वे खरीद सकते हैं, तो इसका जवाब है नहीं।

    इसके लिए अभी इंतजार करना होगा, क्योंकि उच्च एथेनॉल ब्लेंड वाले वाहन अभी शोरूम तक नहीं पहुंचे हैं और न ही इसका फ्यूल नेटवर्क तैयार हुआ है। देश में स्वच्छ यातायात के लिए बीते कुछ वर्षों से ईवी, हाइब्रिड और सीएनजी गाड़ियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। अब फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलाजी की दखल से परिवर्तन की एक बड़ी बुनियाद तैयार हो रही है। इससे कार्बन उत्सर्जन और कच्चे तेल के बिल में निस्संदेह कटौती की जा सकेगी।

    कितनी बड़ी उम्मीद है यह तकनीक

    फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलाजी का सबसे सफल और बड़ा उदाहरण ब्राजील है, जहां दशकों से 80 प्रतिशत से अधिक हल्के वाहन हाइ ब्लेंड एथनाल टेक्नोलाजी पर चल रहे हैं। भारत में एथनाल ब्लेंडिंग की शुरुआत साल 2014 में 1.53 प्रतिशत बेसलाइन के साथ शुरू हुई थी, जिसे 2026 में देशभर में ई20 (20 प्रतिशत एथनाल और 80 प्रतिशत पेट्रोल) के रूप में लागू किया गया। यह शहरी डी-कार्बोनाइजेशन को तेज करने के लिए एक टिकाऊ विकल्प भी है। इंडस्ट्री के जानकारों की मानें तो मौजूदा इंटरनल-कंबशन इंजन में बदलाव करके भी फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां बनाई जा सकती हैं। इस बदलाव में अपेक्षाकृत कठिनाई भी कम है। स्वच्छ यातायात में परिवर्तन धीमी गति और तकनीकी विविधताओं से ही संभव है। किसी एक खास टेक्नोलाजी पर निर्भर होकर स्थायी समाधान ढूंढ़ना संभव नहीं है।

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    क्या होती है एथेनॉल ब्लेंडिंग

    ईंधन में एथेनॉल की मौजूदगी को 'ई' से प्रदर्शित किया जाता है, जैसे ई20 का मतलब है- 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल। इसी तरह E80 में 80 प्रतिशत एथेनॉल और 20 प्रतिशत पेट्रोल। देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले से ही E20 को उपलब्ध कराया जा रहा है और अब अधिक एथेनॉल ब्लेंडिंग वाले ईंधन और इससे चलने वाले वाहनों को बाजार में उतारने की तैयारी है। कन्वेंशनल पेट्रोल के मुकाबले इससे प्रदूषण कम होता है। खास बात है कि इससे वाहन चलाने वालों को उपलब्धता और कीमत के हिसाब से अलग-अलग फ्यूल ब्लेंड के इस्तेमाल करने की सहूलियत मिलती है।

    flex fuel (1)

    ई85 कैसे है अलग

    E85 अधिक एथेनॉल बायोफ्यूल मिश्रण है, जिसमें 80 से 85 प्रतिशत एथेनॉल और 14 से 19 प्रतिशत आम पेट्रोल होता है। यह एक खास हाइ-ऑक्टेन वैकल्पिक ईंधन है, जिसे आम पेट्रोल कारों के बजाय मॉडिफाइड इंटरनल कंबशन इंजन के लिए बनाया गया है। यह उन खास फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल्स के लिए होता है, जो ई20 से लेकर ई100 तक के किसी भी मिश्रण को संभालने के लिए अपनी इंजन मैपिंग को डायनेमिक रूप से एडजस्ट करती हैं।

    कैसे काम करती हैं फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां

    फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल्स (एफएफवी) में ऐसे इंटरनल कंबशन इंजन होते हैं जो पेट्रोल के साथ-साथ एथेनॉल और पेट्रोल के मिश्रण पर भी चल सकते हैं। हालांकि, पारंपरिक पेट्रोल गाड़ियों की तरह इसमें भी सिंगल फ्यूल सिस्टम ही होता है, लेकिन एथेनॉल की केमिकल प्रापर्टी और कमतर ऊर्जा क्षमता के अनुरूप काम करने के लिए कुछ कंपोनेंट को विशेष रूप से डिजाइन किया जाता है। इंजन कंट्रोल माड्यूल (ईसीएम) को एडजस्ट करने के लिए कैलिब्रेट किया जाता है, ताकि गाड़ी विभिन्न प्रकार के फ्यूल ब्लेंड पर भी चल सके। ये गाड़ियां ई20 से लेकर ई85 तक, विशेष स्थिति में ई100 तक फ्यूल रेंज में एडजस्ट करने में सक्षम होती हैं। उनका इंजन मैनेजमेंट सिस्टम स्वतः ही ईंधन में मौजूद एथनाल सांद्रण के साथ एडजस्ट कर अधिकतम परफार्मेंस देता है।

    देश की आर्थिकी से जुड़ती है यह तकनीक

    चूंकि, एथेनॉल को कृषि उत्पादों जैसे गन्ना, मक्का और बायोमास से तैयार किया जा सकता है, जोकि पेट्रोलियम के मुकाबले काफी सस्ता और अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारक है, इसलिए एथेनॉल ब्लेंडिंग को रिन्यूएबल ऑप्शन माना जा सकता है। देश में एथेनॉल उत्पादन में गन्ना सबसे प्राथमिक स्रोत है, जो सहजता से उपलब्ध भी है। सरकार कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है, इससे घरेलू कृषि क्षेत्र के लिए आमदनी का एक नया जरिया भी बनेगा। साथ ही, शहरी प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी यह कारगर होगा।

    flex fuel tech

    चुनौतियां नहीं हैं कम

    1. फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के साथ कुछ चुनौतियां भी होती हैं, जैसे इनकी एनर्जी जनरेट करने की क्षमता पारंपरिक पेट्रोल के मुकाबले कम होती है यानी सबसे बड़ी चुनौती फ्यूल एफिसियंसी की है। दूसरे शब्दों में कहें तो जितना अधिक एथेनॉल ब्लेंडिंग होगी, वाहन का माइलेज उतना ही कम होगा।

    2. यह शुरुआती चरण में है, इसलिए संरचनागत विस्तार की भी चुनौती कुछ वर्षों तक बन रहेगी। हालांकि, सरकार अगले के अंत तक पांच हजार ई100 फ्यूल स्टेशन का लक्ष्य लेकर चल रही है। इससे उम्मीद है कुछ वर्षों में एक बड़ा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तैयार हो जाएगा।

    3. फ्लेक्स फ्यूल पर चलने वाले वाली कुछ बाइक और कारों को प्रदर्शित किया गया है, लेकिन अभी बड़े पैमाने पर इनका प्रयोग और प्रोडक्शन होना बाकी है।

    4. अगर आसानी से फ्यूल स्टेशन उपलब्ध नहीं होंगे, तो ग्राहक ऐसी गाड़ियां खरीदने में हिचकिचा भी सकते हैं।

    फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ी कैसे काम करती है?

    • ड्राइवर एक ही फ्यूल टैंक में कोई भी फ्यूल मिश्रण (जैसे स्टैंडर्ड ई20 से लेकर ई100 तक) तक भर सकता है।
    • फ्यूल कंपोजिशन सेंसर लिक्विड को एनालाइज कर अल्कोहल और गैसोलीन के सही अनुपात का पता लगाता है।
    • सेंसर इस डाटा को इंजन कंट्रोल यूनिट (ईसीयू) को भेजता है।
    • एथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी स्टैंडर्ड पेट्रोल से कम होती है, इसलिए ईसीयू इंजन की सेटिंग्स को एडजस्ट कर लेता है।
    • ईसीयू फ्यूल इंजेक्टर की टाइमिंग और मात्रा को एडजस्ट करता है और स्पार्क प्लग इग्निशन को एडजस्ट करता है।
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि बिना किसी नॉकिंग या इंजन की पावर कम हुए, कंबशन सुचारू रूप से और अधिक क्षमता के साथ होता रहे।

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