बांका की 200 बस्तियों में बेटी के ब्याह जैसी तैयारी, कांवड़ पथ किनारे रोजी-रोटी संवारने में जुटा हर परिवार
बांका की 200 बस्तियों में सावन कांवड़ मेले के लिए बेटी के ब्याह जैसी तैयारियां चल रही हैं, जहां ग्रामीण अपनी रोजी-रोटी के लिए कांवड़ पथ किनारे दुकानें ...और पढ़ें

कांवड़ पथ किनारे रोजी-रोटी संवारने में जुटा हर परिवार
HighLights
बांका की 200 बस्तियों में कांवड़ मेले की तैयारी।
कांवड़ पथ किनारे दुकानें लगाकर ग्रामीण कमाते हैं रोजी-रोटी।
17 जुलाई से शुरू होगा बांग्ला सावन, ग्रामीण उत्साहित।
जागरण संवाददाता, बांका। सावन अभी 17 दिन दूर है। सावन के कांवड़ मेले को भी इतने ही दिनों का इंतजार है। इसका इंतजार शिवभक्तों के साथ सजनी और साजन, कजरी और मेंहदी, बादल और बरसात को भी है। मगर सावन के मेले का सबसे बड़ा इंतजार बांका की दो सौ बस्तियों को है।
सावन आने से पहले ही कच्चा कांवड़ पथ किनारे का यह गांव उत्सवी हो उठा है। वे सावन आने नहीं, उसे लाने की तैयारियों में जुटे हैं। सुबह होते ही इन गांवों में उत्सव का नजारा देखते बन रहा है।
बेटी के ब्याह जैसी तैयारी
बांका जिला सीमा में बदुआ नदी पार करते ही धौरी से लेकर दुम्मा तक अभी हर घर में त्योहार या बेटी ब्याह जैसी तैयारी चल रही है। कोई कच्चा कांवर पथ किनारे की अपनी दुकान का छप्पर छावनी कर रहा है तो कोई बांस और कमाची जुगाड़ कर पथ पर ला रहा है।
बड़ों के अलावा महिलाएं और बच्चे भी इसमें पीछे नहीं हैं। पूरा परिवार कांवर पथ पर चलने वाले अपने दुकान को खड़ा या ठीक करने में जुटा है। क्योंकि सावन का यह मेला ही उनके परिवार को साल भर जीने का सहारा बनता है।
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कांवड़ यात्रा ही रोजी-रोटी का सहारा
पहाड़ी और जंगली आबादी वाले इन गांवों में रहने वाले लोगों के पास साल भर की रोजी-रोटी के लिए इसके अलावा कोई सहारा नहीं है। ना खेती ना कोई रोजगार।
इसलिए प्रशासनिक तैयारी शुरु होने में भले देर-सबेर हो, लेकिन पथ किनारे की बस्तियां 15 दिन पहले कांवड़ियों के स्वागत में तैयार हैं।
17 जुलाई को बांग्ला सावन शुरू
जिलेबिया पहाड़ के पास अपनी दुकानें ठीक कर रहे प्रवीण पंडित, शंकर पंडित, सावन कुमार, नैना देवी आदि बताते हैं कि हमलोगों का जीवन बाबा के भरोसे ही चलता है। 17 जुलाई को बांग्ला सावन शुरू होते ही पैदल कांवरियों चलना शुरू हो जाता है। यानी हमारे लिए अब पांच दिनों का ही समय बचा है।
वे कहते हैं कि प्रशासनिक तैयारी हर बार ऐसे ही चलती है। देखिए अभी ना चापानल लगा है कि धर्मशाला ही ठीक हो रहा है।
दूसरे राज्यों में काम करने वाले भी लौट जाते हैं घर
शिवलोक और चड़िप्पा के पास मिले जगदीश, सूरज आदि ने बताया कि अभी हर गांव में परदेश से काम करने वाले भी लौट रहे हैं। सबलोग दो महीने कांवरिया पथ पर ही कोई ना कोई काम करेगा।
चाय, पानी, नाश्ता, दतवन, स्नान, मोबाइल चार्जिंग, शरीर मालिस, बैंडेज-पट्टी जैसा कुछ भी काम कर हम लोग साल भर परिवार चलाने लायक कमाई कर लेते हैं।
बाबा का नाम पर भी होती है पैसों की बारिश
धौरी में मिले मृगेंद्र सिंह, अमित आदि बताते हैं कि कांवड़िया मेला का अर्थशास्त्र बहुत बड़ा है। इसका आर्थिक पक्ष इस इलाके के लोगों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। सभी पथ पर कोई ना कोई काम कर आमदनी कर लेगा।
नहीं कुछ तो पथ पर बाबा का नाम जपने पर भी पैसा बरसता रहता है। रोजगार के लिए कई प्रांतों से लोग पथ पर आते हैं। लेकिन सबसे बड़ी कमाई स्थानीय लोगों की होती है।
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