Guru Purnima : गुरु-शिष्य के अनमोल रिश्ते को कबीर दास के दोहे से समझिए, आचार्य पंकज अथर्व ने कहा- आत्मचिंतन का उत्सव
भागलपुर में आचार्य पंकज अथर्व ने गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने शिक्षक और सद्गुरु के अंतर को समझाते हुए गुरु को आत्मचिंतन ...और पढ़ें

Guru Purnima: कबीर दास के दोहे से समझिए गुरु-शिष्य का अनमोल रिश्ता, शिक्षक व सद्गुरु में जानिए अंतर
HighLights
गुरु पूर्णिमा आत्मचिंतन और साधना का अवसर है।
सद्गुरु आंतरिक चेतना जगाकर अज्ञान दूर करते हैं।
कबीर ने गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। श्री श्री 1008 लक्ष्मी पीतांबरा महायज्ञ की तैयारियों के सिलसिले में भागलपुर पहुंचे प्रसिद्ध तांत्रिक क्रियायोगी एवं ज्योतिषाचार्य स्मार्त परमहंस आचार्य पंकज अथर्व ने गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में गुरु पूर्णिमा केवल गुरु पूजन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का अवसर है।
शिक्षक और सद्गुरु में क्या है अंतर?
आचार्य पंकज अथर्व ने बताया कि शिक्षक मनुष्य को सांसारिक और बौद्धिक ज्ञान प्रदान कर जीवन-यापन के योग्य बनाता है। इसके विपरीत सद्गुरु साधक की आंतरिक चेतना को जागृत करते हैं। वे शिष्य के भीतर स्थित अज्ञान, मोह और अहंकार को दूर कर उसे उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं।
शास्त्रों और दोहों में गुरु की महिमा
आचार्य पंकज अथर्व ने शास्त्रों और संत कबीर के दोहों के माध्यम से गुरु तत्व की व्याख्या की:
गुरु की परम चेतना का स्वरूप
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
कबीर की वाणी में गुरु का स्थान
"गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
संत कबीर ने गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊंचा स्थान दिया है, क्योंकि गुरु ही ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं।
कुम्हार और घड़े का सुंदर उदाहरण
"गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥"
जिस प्रकार कुम्हार भीतर से सहारा देकर बाहर से चोट मारकर मिट्टी के बर्तन को आकार देता है, उसी प्रकार गुरु शिष्य के दुर्गुणों को दूर कर उसे महान बनाते हैं।
प्राण और अष्टावक्र गीता का संदेश
उन्होंने अष्टावक्र गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शुद्ध, शांत और चेतन है। जब तक शरीर में प्राण का संचार है, तभी तक साधना संभव है। योग में प्राणायाम के जरिए इसी प्राणशक्ति को संतुलित कर मन को अंतर्मुखी बनाया जाता है।
यह भी पढ़ें- Guru Purnima : गुरु पूर्णिमा पूजन की सामग्री और स्टेप-बाय-स्टेप विधि, शुभ मुहूर्त पर दें ध्यान; मिलेगा विशेष फल