6वीं पास देवंती देवी बनीं न्याय की मिसाल, पेड़ के नीचे सुलझाए ग्रामीणों के 2500 से अधिक विवाद
गया की देवंती देवी, छठी पास सरपंच, ने धनगांई पंचायत में 2500 से अधिक मामलों का निपटारा किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी उन्होंने निडर होकर जनसेवा क ...और पढ़ें
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धनगांई पंचायत की रहने वाली देवंती देवी। फोटो जागरण
HighLights
छठी पास देवंती देवी ने की जनसेवा
पेड़ के नीचे सुलझाए 2500 से अधिक मामले
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी निभाई निडर भूमिका
अमित कुमार सिंह, बाराचट्टी (गया)। धनगांई पंचायत की रहने वाली देवंती देवी ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत इरादे और जनसेवा की भावना हो तो सीमित शिक्षा भी बड़ी बाधा नहीं बनती।
छठवीं कक्षा तक पढ़ी देवंती देवी ने साहस, नेतृत्व क्षमता और न्यायप्रियता के बल पर पूरे क्षेत्र में अलग पहचान बनाई हैं।
वर्ष 2011 में पहली बार सरपंच चुनी गईं देवंती देवी ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे निर्णय लिए, जो आज भी लोगों के बीच मिसाल हैं।
नक्सलियों के बीच रहने की मिली सजा
नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में जहां कभी नक्सलियों का दबदबा था और जन अदालतें लगती थीं। वहां देवंती देवी ने निर्भीक होकर जनहित के मुद्दों को उठाया।
उनका घर भी उसी इलाके में था, जहां नक्सलियों का जमावड़ा रहता था, बावजूद इसके वे बेखौफ होकर लोगों के हक की आवाज बुलंद करती रहीं।
इसी दौरान बगल के एक गांव के एक युवक की हत्या नक्सलियों द्वारा कर दी गई। इस मामले में देवंती देवी के विरुद्ध भी नक्सली अधिनियम 17 सीएलए के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसके बाद वर्ष 2015 में उन्हें शेरघाटी जेल भेज दिया गया।
जेल में भी उनका संघर्ष जारी रहा। महिला वार्ड में बंद कैदियों को मिनू के अनुसार भोजन और नाश्ता नहीं मिल रहा था। इस समस्या को लेकर देवंती देवी ने आवाज उठाई और सभी महिला कैदियों के साथ मिलकर हड़ताल कर दी।
उनके इस आंदोलन का असर हुआ और जेल प्रशासन को व्यवस्था सुधारनी पड़ी। इसके बाद कैदियों को निर्धारित मानकों के अनुसार भोजन मिलने लगा।
छोटे-मोटे विवाद चुटकियों में कर दिए हल
जेल से बाहर आने के बाद भी देवंती देवी का जनसेवा का सिलसिला नहीं रुका। वर्ष 2016 के पंचायत चुनाव में उन्होंने दोबारा सरपंच पद पर जीत हासिल की।
हालांकि 2021 के चुनाव में वे मात्र 12 वोट से हार गईं, लेकिन आज भी लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता बरकरार है।
देवंती देवी ने अपने कार्यकाल में हत्या, चोरी, जमीन विवाद, प्रेम प्रसंग और यहां तक कि डायन-भूत जैसे सामाजिक मामलों का भी निष्पादन किया।
खास बात यह रही कि पंचायत में भवन नहीं होने के बावजूद वे पेड़ की छांव में ही कचहरी लगाकर लोगों को न्याय दिलाती रहीं। वे सभी पंच सदस्यों को एकत्र कर पारंपरिक और सामाजिक तरीके से विवादों का समाधान करती थीं।
अब तक वे ढाई हजार से अधिक मामलों का निष्पादन कर चुकी हैं। उनका कहना है कि हजारों मामलों को उन्होंने आपसी समझ, व्यवहार और प्यार से सुलझाया, जिससे लोगों को थाना और कोर्ट के चक्कर से बचाया जा सका।
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आपसी बातचीत से सुलझाती हैं केस
आज वे परिवार आपसी सौहार्द के साथ जीवन जी रहे हैं। कई बार ऐसे मामले भी आए जब थाना और डीएसपी स्तर तक की दखल की जरूरत पड़ी, लेकिन देवंती देवी ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए समाधान का रास्ता निकाला।
यही कारण है कि आज भी पंचायत के लोग उन्हें बेहद प्रिय मानते हैं और छोटे-बड़े विवाद लेकर उनके पास पहुंचते हैं। अपनी आजीविका के लिए वे खेती पर निर्भर हैं, लेकिन जनसेवा का जज्बा आज भी कम नहीं हुआ है।
सुबह से शाम तक उनके दरवाजे पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। देवंती देवी की यह कहानी न सिर्फ महिला सशक्तिकरण की मिसाल है, बल्कि ग्रामीण न्याय व्यवस्था का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी है।
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