गयाजी से ग्लासगो तक का सफर, सोमन राणा ने शाटपुट में जीता गोल्ड; लैंडमाइन ब्लास्ट में गंवाया था पैर
गयाजी के सोमन राणा ने कामनवेल्थ गेम्स 2026 के पुरुष शाटपुट एफ-57 वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा है। ...और पढ़ें

सोमन राणा।
HighLights
सोमन राणा ने कामनवेल्थ गेम्स 2026 में पुरुष शाटपुट में स्वर्ण जीता।
पुंछ हादसे के बाद परिवार के अटूट समर्थन से खेल में लौटे।
अब उनका अगला लक्ष्य पैरालंपिक में भारत के लिए स्वर्ण जीतना।
जागरण संवाददाता, गयाजी। कामनवेल्थ गेम्स 2026 के पुरुष शाटपुट एफ-57 वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर गयाजी के लक्खीबाग मोहल्ले के रहने वाले भारतीय पैरा एथलीट एवं भारतीय सेना के सूबेदार सोमन राणा ने इतिहास रच दिया है।
ग्लासगो में 13.40 मीटर की सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ गोल्ड जीतने वाले सोमन राणा ने दैनिक जागरण से विशेष बातचीत में कहा कि यह सफलता केवल उनकी नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार, कोच, सेना और देशवासियों के विश्वास की जीत है।
उन्होंने कहा कि अगर कठिन समय में परिवार साथ न खड़ा होता तो शायद वह कभी खेल के मैदान तक लौट ही नहीं पाते।
सोमन राणा बताते हैं कि उनका बचपन गयाजी शहर के लक्खीबाग मोहल्ले में बीता।
उनके पिता फोन बहादुर राणा साधारण परिवार से हैं और वर्षों तक निजी तौर पर बच्चों को पढ़ाकर परिवार चलाया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बच्चों की शिक्षा और संस्कार से कभी समझौता नहीं किया।
सोमन कहते हैं, मेरे पिता ने हमेशा सिखाया कि मेहनत ही इंसान की सबसे बड़ी पूंजी होती है। वही सीख आज मुझे यहां तक लेकर आई है।
सेना की वर्दी पहनने का सपना पूरा किया
सोमन ने बताया कि बचपन से ही उनका सपना भारतीय सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा करना था। लगातार मेहनत के बाद उनका चयन भारतीय सेना में हुआ।
किसान परिवार के लिए यह गर्व का क्षण था। सेना ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानने का जज्बा दिया। यही गुण आगे चलकर उनके खेल जीवन की सबसे बड़ी ताकत बने।
एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी
वर्ष 2006 में जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान लैंडमाइन विस्फोट में सोमन गंभीर रूप से घायल हो गए।
इस हादसे में उनका दाहिना पैर गंवाना पड़ा। वे कहते हैं, उस समय लगा कि सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन मेरे परिवार ने मुझे टूटने नहीं दिया। मेरे पिता और पत्नी ने हर दिन यह विश्वास दिलाया कि जिंदगी अभी बाकी है और मैं फिर से देश का नाम रोशन कर सकता हूं।
पत्नी बनीं सबसे बड़ी ताकत
सोमन भावुक होकर बताते हैं कि उनकी पत्नी ने सबसे कठिन दौर में उनका हाथ नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि जब मैं मानसिक रूप से सबसे कमजोर था, तब मेरी पत्नी मेरी सबसे बड़ी शक्ति बनीं।
उन्होंने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अकेला हूं। वर्तमान में सोमन पुणे स्थित आर्मी पैरा प्रशिक्षण केंद्र में अभ्यास करते हैं। वहीं, उनकी पत्नी, एक बेटा, एक बेटी और पिता फोन बहादुर राणा भी उनके साथ रहते हैं।
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परिवार की मौजूदगी उन्हें मानसिक मजबूती देती है। वे कहते हैं कि जब रोज आठ-आठ घंटे अभ्यास करता हूं तो घर लौटने पर परिवार की मुस्कान सारी थकान मिटा देती है।
परिवार ने संभाली जिम्मेदारी, मैं मैदान में उतरा
सोमन बताते हैं कि वर्ष 2012 में सेना के पैरा खिलाड़ियों के संपर्क में आने के बाद उन्होंने पैरा एथलेटिक्स को गंभीरता से अपनाया। वर्ष 2017 से पुणे में नियमित प्रशिक्षण शुरू हुआ।
इस दौरान पत्नी ने घर और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी संभाली, जबकि पिता हर कदम पर मनोबल बढ़ाते रहे। इसी सामूहिक प्रयास का परिणाम है कि उन्होंने एशियन पैरा गेम्स में रजत, राष्ट्रीय स्तर पर कई स्वर्ण पदक और अब कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीता।
अब लक्ष्य पैरालंपिक स्वर्ण
सोमन राणा कहते हैं कि कामनवेल्थ गोल्ड मेरे लिए अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। अब मेरा पूरा ध्यान पैरालंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने पर है।
मैं चाहता हूं कि मेरी कहानी उन युवाओं तक पहुंचे जो किसी कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं। अगर मैं फिर खड़ा हो सकता हूं, तो कोई भी अपने सपनों को पूरा कर सकता है।
बिहार के युवाओं के लिए बने प्रेरणा
सोमन राणा की ऐतिहासिक उपलब्धि पर गयाजी सहित पूरे बिहार में खुशी का माहौल है। गयाजी के स्थानीय पैरा खिलाड़ी हामिद हुसैन कहते हैं कि सोमन राणा ने यह साबित कर दिया है कि छोटे शहरों के खिलाड़ी भी विश्व मंच पर तिरंगा लहरा सकते हैं।
उनका संघर्ष, अनुशासन और परिवार के प्रति सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। ग्लासगो में मिला यह स्वर्ण पदक केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि उस परिवार की भी जीत है जिसने हर कठिन मोड़ पर अपने बेटे का हौसला बनाए रखा।
गयाजी की मिट्टी से निकले इस बेटे ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों और परिवार के अटूट साथ से कोई भी सपना असंभव नहीं होता।
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