लखीसराय: डीएपी खाद की किल्लत से बढ़ी किसानों की चिंता, धान नर्सरी की तैयारी पर असर
सूर्यगढ़ा के किसान खरीफ फसल के लिए धान की नर्सरी तैयार कर रहे हैं, लेकिन डीएपी खाद की कमी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। बाजार में डीएपी की अनुपलब्धता से ध ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संवाद सूत्र, सूर्यगढ़ा (लखीसराय)। खरीफ फसल की बोआई को लेकर प्रखंड क्षेत्र के किसान धान की नर्सरी तैयार करने और खेतों की जुताई में जुट गए हैं। रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के दौरान धान का बिचड़ा गिराने की परंपरा रही है।
ऐसे में किसान समय पर नर्सरी तैयार करने के लिए आवश्यक कृषि कार्यों में लगे हैं, लेकिन इसी बीच बाजार में डीएपी (डाय-अमोनियम फास्फेट) खाद की कमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
धान की नर्सरी तैयार करने के दौरान डीएपी खाद का विशेष महत्व होता है। किसान बिचड़ा तैयार करने के समय डीएपी का उपयोग करते हैं, जिससे पौधे मजबूत, स्वस्थ और तेजी से विकसित होते हैं। इसके बाद धान की रोपाई के समय भी खेतों में डीएपी डाली जाती है। यही कारण है कि खरीफ सीजन शुरू होते ही किसान इसकी खरीदारी कर भंडारण करने लगते हैं।
वर्तमान में बाजार में डीएपी खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। खाद दुकानदार किसानों को एनपीके और एसएसपी जैसे वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग की सलाह दे रहे हैं, लेकिन अधिकांश किसान डीएपी को ही प्राथमिकता देते हैं। किसानों का मानना है कि धान की बेहतर वृद्धि और उत्पादन के लिए डीएपी सबसे प्रभावी उर्वरकों में से एक है।
जानकारी के अनुसार, पिछले वर्ष सूर्यगढ़ा प्रखंड में धान आच्छादन का लक्ष्य लगभग 10,600 हेक्टेयर निर्धारित किया गया था। हालांकि इस वर्ष अभी तक धान आच्छादन का लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है। बावजूद इसके, किसानों ने खेती की तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे में यदि समय पर पर्याप्त मात्रा में डीएपी उपलब्ध नहीं हुई तो धान उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाएगी।
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गरीबनगर गांव के किसान रंजीत कुमार ने बताया कि यदि बाजार में डीएपी खाद की कमी बनी रही तो धान की पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा। इससे किसानों की आय घटेगी और उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होगी। खेती की लागत बढ़ने के बावजूद उत्पादन में कमी आने से किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है।
वहीं, खाद विक्रेताओं का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उत्पन्न बाधाओं का असर रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता पर पड़ रहा है। यदि खाद की आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो इसका प्रतिकूल प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा। इससे न केवल किसानों की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी, बल्कि उनकी आजीविका और आर्थिक स्थिरता पर भी संकट गहरा सकता है।