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    'मेरे देश की धरती सोना उगले': आधुनिकता की दौड़ में बिसेसर ने थमा हल-बैल, बोले- मिट्टी से जुड़ता है आत्मीय रिश्ता

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 09:41 AM (IST)

    मुंगेर के धरहरा में किसान बिसेसर साव आधुनिकता के दौर में भी हल-बैल से खेती कर रहे हैं। वे इसे किफायती, मिट्टी के लिए बेहतर और अपनी परंपरा से जुड़ाव का ...और पढ़ें

    बुजुर्ग किसान (बैलों से प्यार से):"चलो भैया! ट्रैक्टर तो सिर्फ जेब खाली करता है, तुम ही तो धरती मां का असली 'सोना' उगाते हो!"

    बुजुर्ग किसान (बैलों से प्यार से):"चलो भैया! ट्रैक्टर तो सिर्फ जेब खाली करता है, तुम ही तो धरती मां का असली 'सोना' उगाते हो!"

    संवाद सूत्र, धरहरा (मुंगेर)। मनोज कुमार की प्रसिद्ध फिल्म 'उपकार' का अमर गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती..." जब भी कानों में गूंजता है, तो मन में भारत के पारंपरिक किसान और खेत-खलिहानों की जीवंत छवि उभर आती है। आज के आधुनिक दौर में भले ही खेतों में ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट आम हो चुकी है, लेकिन मुंगेर के धरहरा में यह फिल्मी दृश्य आज भी जीवंत है।

    महगामा पंचायत की मिसाल

    धरहरा प्रखंड की महगामा पंचायत अंतर्गत लड़ैयाटाड़ गांव के किसान बिसेसर साव आज भी तकनीक की अंधी दौड़ से दूर हल-बैल के साथ खेत में उतरते हैं। तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि सिर पर पारंपरिक लाल गमछा बांधे बिसेसर साव अपने दो वफादार बैलों के साथ कीचड़ से भरे खेत को जोत रहे हैं।

    पीढ़ियों से चली आ रही विरासत

    करीब साढ़े तीन बीघा कृषि योग्य जमीन पर खेती करने वाले बिसेसर साव के लिए यह महज एक मजबूरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही अनमोल विरासत है। बिसेसर का मानना है कि खेती केवल अन्न उत्पादन का जरिया भर नहीं है, बल्कि यह हमारी धरती मां के साथ जुड़ने का एक बेहद पवित्र और आत्मीय रिश्ता है।

    आधुनिक विकल्पों को नकारा

    यही वजह है कि बाजार में तमाम आधुनिक मशीनों और ट्रैक्टरों के विकल्प मौजूद होने के बावजूद उन्होंने सदियों पुराने हल और बैल का साथ कभी नहीं छोड़ा। अपनी व्यावहारिक समझ को साझा करते हुए बिसेसर साव बताते हैं कि ट्रैक्टर से खेत की जुताई कराने में ईंधन और किराए का खर्च बहुत अधिक बैठता है।

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    Munger Farmer Bisesar Saw Upholds Traditional Plough Farming (1)

    हल से बनती है भुरभुरी मिट्टी

    उन्होंने बताया कि जिस खेत की दो बार (चास) हल-बैल से जुताई करने पर बेहतरीन और भुरभुरी मिट्टी तैयार हो जाती है, वहां ट्रैक्टर से छह बार चलाना पड़ता है। छह बार ट्रैक्टर चलाने के बावजूद मिट्टी उतनी भुरभुरी नहीं बन पाती और न ही धान की रोपाई के लिए वह प्राकृतिक अनुकूल वातावरण तैयार हो पाता है।

    गहराई तक पलटती है मिट्टी

    पारंपरिक हल-बैल से जुताई करने पर लोहे की फाल मिट्टी को काफी गहराई तक पलटती है, जिससे खेत पूरी तरह समतल होता है और उसमें प्राकृतिक नमी बनी रहती है। डीजल के आसमान छूते दामों और महंगाई के इस दौर में हल-बैल से खेती करना छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों के लिए अत्यंत किफायती और लाभदायक साबित होता है।

    जीवंत हो उठी बरसों पुरानी तस्वीर

    गांव के लोग बताते हैं कि जब बिसेसर साव अपने बैलों को हांकते हुए खेत में कदोई करते हैं, तो भारत की सांस्कृतिक खेती की बरसों पुरानी तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। गांव की नई पीढ़ी और युवा भी बेहद उत्सुकता के साथ बिसेसर साव को खेत में काम करते देखते हैं और पारंपरिक कृषि की इस अनमोल कला को सीखते हैं।

    मशीनीकरण के दौर में दिया संदेश

    मशीनीकरण के इस अंधी दौड़ वाले दौर में बिसेसर साव समाज को यह बड़ा संदेश दे रहे हैं कि नई तकनीक का स्वागत करिए, लेकिन अपनी जड़ों को मत भूलिए। उनके खेत में चलता यह हल सिर्फ मिट्टी को ही नहीं जोत रहा, बल्कि हमारी समृद्ध परंपरा, प्रकृति के प्रति प्रेम और खेती के भरोसे को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहा है।

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