नजर न लगे इसलिए रखा था नाम 'झंडू', अब ग्लास्गो में देश का परचम लहराकर बने बिहार के हीरो
नालंदा के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। आर्थिक तंगी और पोलियो से जूझते हुए भी उन्ह ...और पढ़ें

पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार
HighLights
ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल में झंडू कुमार ने कांस्य पदक जीता।
आर्थिक तंगी और पोलियो के बावजूद नहीं मानी हार।
परिवार ने ई-रिक्शा और ठेला बेचकर प्रशिक्षण में मदद की।
राकेश कुमार वीरेंद्र, हरनौत (नालंदा)। कभी परिवार का पेट पालने के लिए ठेला लगाने और ई-रिक्शा चलाने वाले नालंदा के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लास्गो में देश का परचम लहरा दिया। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी नियति नहीं माना।
राष्ट्रमंडल खेल में मेंस हैवीवेट (72 किग्रा) पैरा पावरलिफ्टिंग में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने भारत के पदकों का खाता खोला।
उनकी सफलता पर पिता रामानंद पासवान और मां कमला देवी की आंखें खुशी से भर आईं।
नजर से बचाने के लिए माता-पिता ने रखा था झंडू नाम
28 वर्षीय झंडू का जन्म नालंदा के एक निर्धन परिवार में हुआ। माता-पिता ने उनका नाम झंडू रखा। परिवार के अनुसार, यह नाम यूं ही पुकारते-पुकारते पड़ गया।
गांव में मान्यता है कि बच्चे का नाम कुछ अलग रखा जाए तो उसे नजर नहीं लगती। आज उसी झंडू की सफलता पर देश-दुनिया की नजर है।
चार वर्ष की उम्र में पोलियो के कारण वह दिव्यांग हो गए, लेकिन उन्होंने इसे अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया।
सब्जी की दुकान से ठेले तक, ऐसे शुरू हुआ सफर
बचपन से ही झंडू भारी सामान उठाने का प्रयास करते थे। धीरे-धीरे उनका रुझान पावरलिफ्टिंग की ओर बढ़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी।
माता-पिता सब्जी की दुकान चलाते थे और झंडू भी उनकी मदद करते थे। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने ठेला लगाया और ई-रिक्शा भी चलाया।
जब कोच ने बताया कि पावरलिफ्टिंग में आगे बढ़ने के लिए पौष्टिक आहार और शारीरिक ताकत जरूरी है, तब आर्थिक संकट और गहरा गया।
तैयारी के लिए बेच दिया ई-रिक्शा और ठेला
झंडू की खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार ने बड़ा त्याग किया। पौष्टिक आहार और प्रशिक्षण का खर्च जुटाने के लिए घरवालों ने ई-रिक्शा और ठेला बेचने की अनुमति दे दी।
इन्हें बेचकर मिली रकम से झंडू ने अपनी तैयारी जारी रखी। लगातार मेहनत और लक्ष्य के प्रति समर्पण का परिणाम अब राष्ट्रमंडल खेल के कांस्य पदक के रूप में सामने आया है।
पदक जीतने के बाद सब्जी की दुकान पर पहुंच रहे लोग
राष्ट्रमंडल में पदक जीतने की खबर मिलते ही झंडू के माता-पिता की सब्जी की दुकान पर बधाई देने वालों का तांता लग गया।
मां कमला देवी ने कहा कि झंडू बचपन से मेहनती और लगनशील है। उसने दिव्यांगता को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया।
परिवार को खेल की ज्यादा जानकारी नहीं थी, झंडू ही बताता था कि वह वजन उठाने का खेल खेलता है।
परिवार की आय का बड़ा हिस्सा उसकी तैयारी पर खर्च होता था। अब परिवार को सरकार से घर मिलने की उम्मीद है।
तीन बार मिल चुका है बिहार खेल सम्मान
झंडू की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2024 से उनके सभी खर्च भारत सरकार उठा रही है। बिहार सरकार ने भी उन्हें तीन बार बिहार खेल सम्मान दिया है।
उनके कोच रहे नालंदा लक्ष्य पारा खेल अकादमी के सचिव कुंदन कुमार पांडेय ने बताया कि सम्मान के तहत प्रशंसा पत्र और दो-दो लाख रुपये मिले हैं।
झंडू को अब उच्चस्तरीय स्कालरशिप के लिए चयनित किए जाने की संभावना है। वहीं, बिहार सरकार की पदक लाओ, नौकरी पाओ योजना के तहत लेवल नौ की नौकरी की प्रक्रिया भी चल रही है।
विधानसभा अध्यक्ष ने दी झंडू को बधाई
विधानसभा अध्यक्ष डा. प्रेम कुमार ने राष्ट्रमंडल खेल में कांस्य पदक जीतने पर झंडू कुमार को हार्दिक बधाई दी।
उन्होंने कहा कि झंडू के शानदार प्रदर्शन ने देश और प्रदेश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है।
मेंस हैवीवेट (72 किग्रा) पैरा पावरलिफ्टिंग में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने इस महामुकाबले में भारत के पदकों का खाता खोला है।
उन्होंने झंडू की उपलब्धि को देश और बिहार के लिए अत्यंत हर्ष और उल्लास का प्रसंग बताया।
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