26 लाख में 4 करोड़ की जमीन; तीन दिन में नौकरी, लैंड फॉर जॉब घोटाले की परत-दर-परत कहानी
दिल्ली की राउज एवेन्यू सीबीआई अदालत ने 'लैंड फॉर जॉब' मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, मीसा भारती और हेमा यादव सहित 41 आरोपियों पर आरोप तय किए ...और पढ़ें

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राधा कृष्ण, पटना। रेलवे में नौकरी दिलाने के बदले जमीन लेने के आरोपों से जुड़ा ‘लैंड फॉर जॉब’ मामला अब अपने सबसे अहम मोड़ पर पहुंच गया है। दिल्ली के राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत ने पूर्व रेल मंत्री और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बेटियों मीसा भारती और हेमा यादव सहित कुल 41 आरोपितों पर आरोप तय कर दिए हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह केवल अलग-अलग सौदों का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित आपराधिक साजिश प्रतीत होती है, जिसमें पूरे परिवार ने एक सिंडिकेट की तरह काम किया।
इस फैसले के साथ ही उस पूरे खेल की परतें फिर से खुलने लगी हैं, जिसमें कथित तौर पर रेलवे की ग्रुप-डी नौकरियों के बदले बिहार में कीमती जमीनें कौड़ियों के भाव लालू परिवार के नाम कराई गईं।
कहां से शुरू हुई कहानी
मामले की जड़ें 2004 से 2009 के उस दौर में जाती हैं, जब लालू प्रसाद यादव यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे। सीबीआई के मुताबिक इसी दौरान रेलवे के अलग-अलग जोनों में बिना विज्ञापन और तय प्रक्रिया के कई नियुक्तियां की गईं।
आरोप है कि इन नियुक्तियों के बदले नौकरी चाहने वालों या उनके परिजनों से जमीन ली गई।
सबसे चर्चित मामला 6 फरवरी 2008 का है। पटना के किशुन देव राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट जमीन महज 3.75 लाख रुपये में राबड़ी देवी के नाम रजिस्ट्री कर दी।
यह कीमत बाजार मूल्य से कई गुना कम थी। इसी साल उनके परिवार के तीन सदस्यों, राजकुमार सिंह, मिथिलेश कुमार और अजय कुमार, को मध्य रेलवे मुंबई में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई। सीबीआई ने इसे ‘नौकरी के बदले जमीन’ का सीधा उदाहरण माना।
26 लाख में 4.39 करोड़ की जमीन
जांच एजेंसी का दावा है कि ऐसे ही कई सौदों के जरिए लालू परिवार ने बिहार में एक लाख वर्ग फीट से अधिक जमीन मात्र 26 लाख रुपये में हासिल कर ली, जबकि उस समय सर्किल रेट के हिसाब से इन जमीनों की कीमत करीब 4.39 करोड़ रुपये थी।
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कई मामलों में जमीन मालिकों को नकद भुगतान दिखाया गया या फिर गिफ्ट डीड के जरिए जमीन ट्रांसफर कराई गई।
बिना विज्ञापन, बिना प्रक्रिया
सीबीआई और ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि इन भर्तियों के लिए न तो कोई सार्वजनिक विज्ञापन निकाला गया और न ही रेलवे की तय चयन प्रक्रिया का पालन हुआ।
कई मामलों में तो आवेदन मिलने के महज तीन दिन के भीतर नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए। कुछ उम्मीदवारों के आवेदन अधूरे पते या दस्तावेजों के साथ ही मंजूर कर लिए गए।
सात सौदे, जिन पर टिकी पूरी जांच
जांच एजेंसियों ने चार्जशीट में सात प्रमुख डील का जिक्र किया है, जिनके आधार पर पूरे घोटाले की संरचना सामने आती है।
- किशुन देव राय की जमीन के बदले तीन लोगों को नौकरी मिली।
- महुआबाग निवासी संजय राय ने 3.75 लाख में जमीन दी और परिवार के दो सदस्यों को रेलवे में जगह मिली।
- किरण देवी ने 2007 में अपनी जमीन मीसा भारती को बेची और 2008 में उनके बेटे का चयन सेंट्रल रेलवे मुंबई में हो गया।
- हजारी राय की जमीन एक निजी कंपनी को बेची गई, जो बाद में मीसा भारती और राबड़ी देवी के नियंत्रण में चली गई, जबकि उनके भतीजों को रेलवे में नौकरी मिल गई।
- लाल बाबू राय के बेटे को पहले नौकरी मिली और वर्षों बाद जमीन राबड़ी देवी के नाम कर दी गई।
- नौकरी पाने के बाद 62 लाख मूल्य की जमीन गिफ्ट डीड से हेमा यादव को दी गई।
- नौकरी मिलने के कुछ वर्षों बाद जमीन हेमा यादव के नाम ट्रांसफर हुई।
नाबालिग बेटों के नाम जमीन
सीबीआई की चार्जशीट में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। आरोप है कि 14 जून 2005 को एक व्यक्ति ने अपने बेटे को रेलवे में नौकरी दिलाने के लिए मात्र 5,700 रुपये में दो जमीनें राबड़ी देवी के संरक्षण में तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के नाम कर दीं। उस समय दोनों नाबालिग थे।
छापे और कानूनी कार्रवाई
मई 2022 में सीबीआई ने लालू यादव, राबड़ी देवी, मीसा भारती और अन्य परिजनों के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इसके बाद इस साल अगस्त में फिर से छापे पड़े। जांच के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया।
अदालत की सख्त टिप्पणी
राउज एवेन्यू कोर्ट ने आरोप तय करते हुए कहा कि आरोपितों की भूमिकाएं आपस में जुड़ी हुई थीं और सभी ने साझा उद्देश्य के तहत काम किया। अदालत के अनुसार, यह मामला सरकारी पद के दुरुपयोग और निजी लाभ के लिए की गई सुनियोजित साजिश का प्रतीत होता है।
बहुचर्चित मामले में नियमित सुनवाई शुरू
अब आरोप तय होने के बाद इस बहुचर्चित मामले में नियमित सुनवाई शुरू होगी। अभियोजन पक्ष सबूत पेश करेगा और बचाव पक्ष को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।
यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला न केवल लालू परिवार, बल्कि भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े उदाहरणों में एक माना जाएगा।
फिलहाल, ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला सत्ता, परिवार और व्यवस्था के उस गठजोड़ की कहानी बन चुका है, जहां रेलवे की नौकरी किसी मेरिट नहीं, बल्कि जमीन की रजिस्ट्री से तय होती दिखी।
अदालत की टिप्पणी के बाद अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि कानून की कसौटी पर यह पूरा मामला किस अंजाम तक पहुंचता है।
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