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    पटना में साइबर ठगों की शातिर चाल, फोन से निकल कर रहे घर की रेकी

    Updated: Fri, 10 Jul 2026 05:27 AM (GMT+05:30)

    साइबर अपराधी अब डिजिटल अरेस्ट के नाम पर सिर्फ धमका नहीं रहे, बल्कि घर की रेकी और फर्जी पुलिसकर्मी भेजकर ठगी कर रहे हैं। ...और पढ़ें

    प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई सांकेतिक तस्वीर। (जागरण)

    प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई सांकेतिक तस्वीर। (जागरण)

    HighLights

    1. साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का तरीका बदला, घर तक पहुंचे।

    2. फर्जी पुलिसकर्मी भेजकर, घर की रेकी कर ठगी कर रहे।

    3. पटना में दो बुजुर्गों से करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी हुई।

    जागरण संवाददाता, पटना। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का तरीका पुराना हुआ तो साइबर अपराधियों ने नया व खतरनाक तरीका ढूंढ निकाला, जिससे पुलिस की नींद उड़ गई है।

    अब साइबर अपराधी सिर्फ डिजिटल अरेस्ट यानी वीडियो काल कर ही नहीं धमका रहे हैं, बल्कि पीड़ितों के घर की रेकी, तस्वीरें भेज, फर्जी पुलिसकर्मी दिखा या घर के बाहर अपने आदमी खड़े कर विश्वास दिला रहे हैं कि उनके खिलाफ पुलिस या केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई चल रही है।

    वे पीड़ित को मानसिक रूप से इस कदर तोड़ देते हैं कि वह बिना किसी से सलाह लिए जीवनभर की जमा-पूंजी साइबर ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दे रहे हैं।

    साइबर अपराधियों के निशाने पर खासकर अकेले रहने वाले बुजुर्ग हैं। राजधानी में इस तरह के दो मामले सामने आ चुके हैं। एक मामले में 78 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर से 3.70 करोड़ रुपये ठगे गए, जबकि दूसरे केस में रिटायर्ड फौजी से 3.30 लाख रुपये ऐंठ लिए।

    इससे साफ हो गया है कि अब साइबर अपराधियों के डिजिटल अरेस्ट का जाल मोबाइल फोन से निकलकर लोगों के घर की चौखट तक पहुंच गया है।

    डर नहीं, झूठ को सच बना रहे अपराधी

    साइबर थाना के पुलिस अधिकारियों ने जांच में पाया कि साइबर अपराधियों की नई रणनीति केवल धमकी देने की नहीं, बल्कि अपने झूठ को सच साबित करने की है।

    पहले बैंक अधिकारी, फिर पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बनकर फोन किया जाता है। इसके बाद वीडियो काल, फर्जी पहचान पत्र, पुलिस की वर्दी, घर की तस्वीरें और स्थानीय स्तर पर व्यक्ति भेजकर यह भरोसा दिलाया जाता है कि सरकारी एजेंसियां वास्तव में कार्रवाई कर रही हैं।

    केस 1: दो दिन तक डिजिटल अरेस्ट, घर पहुंचा फर्जी पुलिसकर्मी

    कदमकुआं निवासी 78 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर ज्योति वर्मा को साइबर अपराधियों ने 48 घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रखा। उन्हें विभिन्न केंद्रीय जांच एजेंसियों का डर दिखाते हुए लगातार वीडियो काल पर रखा गया।

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    इसी दौरान पुलिसकर्मी बनाकर एक व्यक्ति उनके घर भेजा गया। घर पर उसकी मौजूदगी से प्रोफेसर को विश्वास हो गया कि वास्तव में उनके खिलाफ कार्रवाई चल रही है और वे पुलिस की निगरानी में हैं।

    मानसिक दबाव इतना बढ़ा कि उन्होंने 3.70 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए। बाद में ठगी का अहसास होने पर मामला साइबर थाने पहुंचा।

    केस 2: घर की तस्वीरें भेजीं और बाहर आदमी खड़ा किया

    रिटायर्ड फौजी ने किया आत्महत्या का प्रयास

    महेंद्रू के एक रिटायर्ड फौजी को पहले बैंक अधिकारी बनकर फोन किया गया। इसके बाद खुद को पुलिस अधिकारी बताकर देशद्रोह के मामले में फंसाने की धमकी दी।

    अपराधियों ने उन्हें दस दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा। इस दौरान उनके घर की तस्वीरें भेजीं, पुलिस की वर्दी पहनकर वीडियो कॉल की और घर के बाहर एक व्यक्ति भी भेजा।

    इससे बुजुर्ग को लगा कि पुलिस वास्तव में उन पर नजर रख रही है। उन्होंने अपनी भतीजी की शादी के लिए जमा 3.30 लाख रुपये आरटीजीएस के माध्यम से ठगों के खाते में भेज दिए। घटना के बाद वे गहरे सदमे में चले गए, आत्महत्या का प्रयास किया और 17 दिनों तक घर से बाहर नहीं निकले।

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    देश में कोई भी जांच एजेंसी या पुलिस अधिकारी फोन या वीडियो काल के माध्यम से किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती और न ही जांच के नाम पर रुपये ट्रांसफर करने का निर्देश देती है। यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआइ, ईडी, एनसीबी या किसी अन्य एजेंसी का अधिकारी बताकर इस तरह का दबाव बनाता है तो तुरंत काल काटकर इसकी सूचना साइबर हेल्पलाइन 1930 या साइबर थाना को दें।

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    - नीतीश चंद्र धाड़िया, डीएसपी, साइबर थाना