GDP विवाद पर एक्सपर्ट्स की दो टूक: नतीजों पर सवाल उठाना गलत, फरवरी में ही दी गई थी नए तरीके की जानकारी
जीडीपी विकास दर पर विपक्ष द्वारा उठाए गए विवाद पर विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि आधार वर्ष बदलने से ...और पढ़ें

आधार वर्ष बदलने से जीडीपी आंकड़ों में बदलाव स्वाभाविक है।
HighLights
आधार वर्ष बदलने से जीडीपी आंकड़ों में बदलाव स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों ने जीडीपी हेरफेर के आरोपों को सिरे से खारिज किया।
फरवरी में ही नए आधार वर्ष की जानकारी सार्वजनिक की गई थी।
राजीव कुमार, नई दिल्ली। जीडीपी विकास दर को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। विपक्ष की ओर से इसे लेकर कई तर्क दिए जा रहे हैं। विवाद तब और बढ़ा जब पूर्व वित्त सचिव एस.सी. गर्ग ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी विकास दर को कम करके इस बार 7.8 की बढ़ोतरी दिखाई जा रही है।
जबकि भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् और प्रख्यात अर्थशास्त्री टी.सी.ए. अनंत ने बताया कि जीडीपी मापने के नए आधार वर्ष 2022-23 पर पिछले वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के जीडीपी में गिरावट सामान्य बात है। पिछले साल इस अवधि के जीडीपी को आधार वर्ष 2011-12 पर मापा गया था। तब जीडीपी 86.1 लाख करोड़ था। नए आधार वर्ष पर यह जीडीपी घटकर 80 लाख करोड़ हो गया। यह भी ध्यान रहे कि वित्त विभाग से उर्जा मे भेजे जाने के बाद गर्ग ने वोलंटरी रिटायरमेंट ले लिया था।
हर दस साल में बदला जाता है बेस इयर
सामान्यतः हर दस साल में बेस इयर बदल दिया जाता है। 2026-27 की पहली तिमाही का आकलन पहली बार बदले हुए बेस इयर यानी 2011-12 की बजाय 2022-23 के आधार पर किया गया है। जाहिर है कि कुछ बदलाव होंगे ।
भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् और प्रख्यात अर्थशास्त्री टी.सी.ए. अनंत ने बताया कि नए आधार वर्ष 2022-23 पर जीडीपी गणना के फैसले के बाद वित्त वर्ष 2022-23, वित्त वर्ष 2023-24, वित्त वर्ष 2024-25 और वित्त वर्ष 2025-26 के सभी जीडीपी व अन्य आंकड़ों को नए आधार वर्ष के मुताबिक बदल दिया गया। इस बदले हुए आंकड़ों से ही पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी की तुलना इस साल की समान अवधि से की गई और यही चलन है। लेकिन विपक्ष की ओर से इसी पर विवाद खड़ा किया जा रहा है।
यही कारण है कि 2011-12 के आधार वर्ष पर पिछले वित्त वर्ष 2025-26 का जीडीपी 357 लाख करोड़ था जो नए आधार वर्ष 2022-23 पर घटकर 345 लाख करोड़ हो गया। अनंत के मुताबिक वर्ष 2015 में जब जीडीपी मापने के आधार वर्ष 2004-05 को बदलकर 2011-12 किया गया था, तब भी इस प्रकार की शिकायतें हुईं थी।
बेस ईयर बदलने होता है बदलाव
बेस ईयर बदलने पर आंकड़ों में बदलाव इसलिए भी हो जाता है क्योंकि पहले कई ऐसी चीजें होती थी जिनका हर साल आंकड़ा नहीं मिलता है या उनका डाटा नहीं होता है। ऐसे में इन चीजों में कुछ का ज्यादा अनुमान लग जाता था तो कुछ का कम।
नए आधार वर्ष को वैश्विक स्तर पर सटीक बनाने की कोशिश की गई है और इस पूरी प्रक्रिया के बारे में इस साल फरवरी में सांख्यिकी विभाग की तरफ से पूरी जानकारी सार्वजनिक की गई थी। पहले के आधार वर्ष में कई चीजें जिनका अनुमान कई सालों में एक बार होने वाले सर्वे के आधार पर तैयार किया जाता था, अब नए आधार वर्ष में उनकी गणना करने पर उसमें बदलाव आ जाता है। पूरी प्रक्रिया के बदलाव के बारे में सबको पता था। अनंत ने बताया कि अब अगर नए आधार वर्ष पर जीडीपी अनुमान के परिणाम पसंद नहीं आ रहे हैं तो प्रक्रिया को गलत बताना ठीक नहीं है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय सचिव सौरभ गर्ग के मुताबिक जब भी सालाना आधार पर यानी कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही का पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही आंकड़ों की तुलना की जाएगी तो वह कांस्टेंट प्राइस यानी कि आधार वर्ष पर आधारित होगी। करंट प्राइस यानी कि चालू मूल्य महंगाई से जुड़े मूल्य भी शामिल होते हैं। इसलिए करंट प्राइस पर ऐसा नहीं किया जाता है। चालू वित्त वर्ष से नया आधार वर्ष आ गया तो पिछले साल की पहली तिमाही के जीडीपी को नए आधार वर्ष पर लाकर ही उसकी तुलना होगी। पूर्व वित्त सचिव कह रहे हैं कि नए आधार वर्ष पर पिछली तिमाही की विकास दर को जानबूझ कर कम कर दिया गया।
आधार वर्ष बदलने पर अनुमान में आती है कमी
अर्थशास्त्री एवं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी के प्रोफेसर पिनाकी चक्रबर्ती कहते हैं, "जब भी आधार वर्ष बदलता है तो पिछले साल की समान अवधि के अनुमान में कमी आती है। पिछले 50 साल से ऐसा हो रहा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी अनुमान को अच्छा बताने के लिए पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के अनुमान को कम किया गया है, ऐसा कहना उचित नहीं है।"
सांख्यिकीय विभाग के मुताबिक अब तक देश में काफी अधिक संख्या में मौजूद छोटे उद्यमी व घरों से चलने वाले कारोबार को जीडीपी में शामिल करने के लिए औनपचारिक प्रकार के सर्वे के आंकड़ा का इस्तेमाल किया जाता था। नए आधार वर्ष में नियमित रूप से हर साल होने वाले कायदे के सर्वे का डाटा इनके लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
भारत में जीडीपी का अनुमान दो तरीके से जारी किया जाता है। पहला यह है कि सभी उत्पादन का मूल्य को जोड़कर तो दूसरा आम जनता, कारोबारी व सरकार के खर्च को जोड़कर। सैद्धांतिक तौर पर दोनों अनुमान समान होना चाहिए, लेकिन प्रायः ऐसा नहीं होता है। क्योंकि खर्च के कई डाटा मिसिंग होते हैं या बाद में मिलते हैं।
