बाहर आएगा घरों में रखा 25000 टन सोना! Gold Monetisation स्कीम को और बेहतर बनाने की मांग; गहनों पर मिलता है ब्याज
जेम एंड ज्वैलरी काउंसिल ऑफ इंडिया (GJC) ने घरों में निष्क्रिय पड़े 25,000 टन सोने को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाने के लिए गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम क ...और पढ़ें
HighLights
GJC ने गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम को डिजिटल करने का प्रस्ताव दिया।
घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को वित्तीय प्रणाली में लाना है लक्ष्य।
डिजिटल सिस्टम से पारदर्शिता बढ़ेगी, देश का CAD सुधरेगा।
नई दिल्ली। जेम एंड ज्वैलरी काउंसिल ऑफ इंडिया ने मौजूदा 'गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम' (Gold Monetisation Scheme) को डिजिटल सिस्टम में ट्रांसफर करने की सिफारिश की है। दरअसल, इस उद्योग निकाय ने स्वर्ण मुद्रीकरण योजना में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव रखा है, ताकि घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाया जा सके। भारत की रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद (GJC) भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) के साथ मिलकर इस स्कीम को लेकर रिस्ट्रक्चरिंग फ्रेमवर्क तैयार करने के लिए बातचीत कर रही है।
इस काउंसिल ने बैंकिंग, रिफाइनिंग और ज्वैलरी सेक्टर के हितधारकों के साथ परामर्श के माध्यम से विकसित एक ज्वैलर-इंटीग्रेटेड मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसका उद्देश्य मौजूदा गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में संरचनात्मक कमियों को दूर करना और इसकी व्यापकता और उपयोग को बढ़ाना है।
क्या है प्रस्ताव और मकसद?
दरअसल, इस प्रस्ताव का अहम मकसद डिजिटल गोल्ड सिस्टम की ओर परिवर्तन है। इस नजरिये के तहत, आभूषण, सोने की सिल्लियां और सिक्के समेत फिजिकल गोल्ड स्टोरेज को डिजिटल बैलेंस में परिवर्तित किया जाएगा और स्ट्रक्चर्ड अकाउंट सिस्टम के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के अंदर रखा जाएगा। यह फ्रेमवर्क, रेगुलेटरी स्टैंडर्ड के अनुरूप बनाया गया है, साथ ही सर्विलांस और ऑपरेशनल इफिशिएंसी को भी मजबूत करता है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का अनुमान है कि भारत में घरों और मंदिरों में लगभग 25000 टन सोना जमा है, जो 2026 में भारत के अनुमानित नॉमिनल जीडीपी का लगभग 56 प्रतिशत है।
फिजिकल गोल्ड का डिजिटलीकरण, कैसे?
GJC ने प्रस्ताव दिया है कि ग्राहकों के पास मौजूद फिजिकल गोल्ड, जिनमें गहने, सिक्के या बिस्कुट को बैंकिंग सिस्टम में 'डीमैट' रूप में बदलने की सुविधा दी जाए। नई व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि लोग अपने इस खाली पड़े सोने को बिना बेचे ही ब्याज देने वाले वित्तीय साधन में बदल सकें।
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GJC के अध्यक्ष राजेश रोकड़े और उपाध्यक्ष अविनाश गुप्ता के अनुसार, पुराना गोल्ड मोनेटाइजेशन सिस्टम उतना सफल नहीं रहा है। इसलिए यह नया मॉडल ज्वैलर्स, बैंकों और रिफाइनरों के साथ विचार-विमर्श करके तैयार किया गया है ताकि इसे अधिक व्यावहारिक और लोगों के लिए सुलभ बनाया जा सके।
इस नए मॉडल में ज्वैलर्स को एक रेगुलेटेड डिजिटल सिस्टम से जोड़ा जाएगा। इससे ग्राहकों के लिए पारदर्शिता बढ़ेगी, उनका भरोसा मजबूत होगा और सोने के लेन-देन की डिजिटल ट्रैकिंग की जा सकेगी।
स्कीम में बदलाव क्यों जरूरी?
जेम एंड ज्वैलरी काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से इस स्कीम में बदलाव का यह प्रस्ताव सोने, विशेष रूप से बुलियन और सिक्कों में निवेश की मांग में लगातार वृद्धि के बीच आया है। GJC ने कहा कि रिवाइज्ड फ्रेमवर्क का उद्देश्य निवेशकों को एक ऐसा पक्का रास्ता दिया जाए, जहां वे अपने घर में रखे सोने को बेचे बिना ही उससे कमाई (ब्याज के रूप में) कर सकें।
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इस तरह जो सोना घरों में बेकार रखा रहता था, वह बैंकिंग सिस्टम (मुख्य अर्थव्यवस्था) में आ जाएगा, जिससे लोगों को तो फायदा होगा ही और देश को भी लाभ मिलेगा। इससे विदेशों से सोने के आयात (Imports) पर भारत की निर्भरता कम होगी, जिससे देश का 'करंट अकाउंट डेफिसिट' (CAD) सुधारने में मदद मिलेगी।