टाटा-मारूति नहीं, बिड़ला की ये कंपनी थी देश की पहली कार निर्माता, आजादी से 5 साल पहले स्थापना; आपने सुना नाम?
भारत की पहली कार कंपनी हिंदुस्तान मोटर्स थी, जिसकी स्थापना बिड़ला ग्रुप ने 1942 में की थी। इसने प्रतिष्ठित एंबेसडर कार का निर्माण (Oldest Car Manufact ...और पढ़ें

भारत की पहली कार कंपनी का अरबपति बिड़ला परिवार से जुड़ा है नाता।

समय कम है?
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नई दिल्ली। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजारों में से एक है। भारतीय सड़कों पर बजट हैचबैक से लेकर लग्जरी SUV तक, दर्जनों विदेशी और देसी ब्रांड्स की कारें दौड़ रही हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि भारत की पहली कार कंपनी (First Car Company In India) कौन सी थी? इसका जवाब हमें इतिहास के उस दौर में ले जाता है जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दहलीज पर था और कुछ दूरदर्शी उद्योगपतियों ने देश में ही कार बनाने का साहस दिखाया था। आइए जानते हैं देश की इस पहली ऑटोमोबाइल कंपनी के इतिहास और सफर के बारे में।
भारत की पहली कार कंपनी कौन सी थी?
हिंदुस्तान मोटर्स (Hindustan Motors) भारत की पहली कार कंपनी थी, जिसकी शुरुआत देश को आजादी मिलने से भी पहले, साल 1942 में हुई थी। भारत के सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों में से एक, बिड़ला ग्रुप (Birla Group) ने इसकी नींव रखी थी।
कंपनी के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड की स्थापना स्वतंत्रता पूर्व युग में गुजरात के पोर्ट ओखा में की गई थी। बाद में, 1948 में इसके मैन्युफैक्चरिंग प्लांट को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के उत्तरपाड़ा में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से देश की सबसे आइकोनिक कार का उत्पादन शुरू हुआ।
इस ऐतिहासिक कंपनी के संस्थापक कौन थे?
हिंदुस्तान मोटर्स मशहूर बिड़ला ग्रुप के बी.एम. बिड़ला (B.M. Birla) के दिमाग की उपज थी। 1942 में इस कंपनी को इस उद्देश्य के साथ स्थापित किया गया था कि भारत ऑटोमोबाइल उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।
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यह वह समय था जब भारत पूरी तरह से आयातित कारों पर निर्भर था। ऐसे में कारों का स्थानीय निर्माण एक बेहद क्रांतिकारी विचार था। बिड़ला ग्रुप ने देश में परिवहन की बढ़ती जरूरतों को पहचाना और पहली कार कंपनी की मजबूत नींव रखी।
देश की पहली स्वदेशी कार कौन सी थी?
जब भी हिंदुस्तान मोटर्स का जिक्र होता है, तो उस कार की बात होना लाजमी है जिसने लगभग 50 सालों तक भारतीय सड़कों पर राज किया 'एंबेसडर' (Ambassador)। ब्रिटेन की 'मॉरिस ऑक्सफोर्ड सीरीज III' (Morris Oxford Series III) पर आधारित इस कार का उत्पादन 1958 में शुरू हुआ था। यह पूरी तरह से भारत में निर्मित थी, इसलिए इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता था।
अपनी चौड़ी बॉडी, बड़े स्पेस और मजबूत बिल्ड क्वालिटी के कारण यह दशकों तक राजनेताओं, सरकारी अधिकारियों और भारतीय परिवारों की पहली पसंद बनी रही। इसे भारतीय सड़कों के हिसाब से ही तैयार किया गया था।

आखिर हिंदुस्तान मोटर्स और 'एंबेसडर' का क्या हुआ?
अपने शानदार और गौरवशाली इतिहास के बावजूद, उदारीकरण के बाद आए बदलावों और नई प्रतिस्पर्धा के सामने हिंदुस्तान मोटर्स टिक नहीं सकी। भारतीय बाजार में नई, ज्यादा माइलेज देने वाली और स्टाइलिश कारों की बाढ़ आ गई, जिससे एंबेसडर की मांग लगातार गिरती चली गई।
भारी नुकसान और ऑपरेशनल चुनौतियों के कारण 2014 में कंपनी ने भरे मन से एंबेसडर का उत्पादन बंद कर दिया। इस खबर ने उन कई भारतीयों को भावुक कर दिया था जिनकी यादें इस कार से जुड़ी थीं।
साल 2017 में, हिंदुस्तान मोटर्स ने एंबेसडर का ब्रांड नाम एक फ्रांसीसी मोटर समूह, ग्रुप पीएसए (Groupe PSA जिसे अब स्टेलेंटिस कहा जाता है) को लगभग ₹80 करोड़ में बेच दिया।
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