US से फिर आई 'टैरिफ सुनामी', 100% टैक्स बिल दे रहा ये संकेत; भारत-चीन को रूसी तेल खरीदने की चुकानी होगी कीमत?
अमेरिका एक नए बिल के जरिए रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा है, जिससे भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों पर असर पड़ सकता ...और पढ़ें

अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ की धमकी।
HighLights
अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ की धमकी।
भारत के कुल तेल आयात का 50-55% रूस से आता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के लिए रूसी तेल ऊर्जा सुरक्षा में अहम।
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक ऐसे नेता बनकर उभरे हैं, जिन्हें पढ़ या समझ पाना आसान नहीं है। हर पल उनके बयान बदलते रहते हैं, उनके एक्शन बदलते रहते हैं। एक साल पहले 5 अगस्त 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति ने रूस से कच्चे तेल खरीदने पर भारत पर 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। इस अतिरिक्त टैरिफ के बाद भारत पर कुल टैरिफ बढ़कर 50 फीसदी हो गया था। लेकिन एक साल में बहुत कुछ बदला। टैरिफ कम हुआ। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को अवैध करार दिया। और इस समय भारत में बने लगभग 70% एक्सपोर्ट जिनमें टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग का सामान और केमिकल शामिल हैं पर 10% (Trump Tariff) का बेसलाइन 'सेक्शन 301' टैरिफ लगाता है। स्टील, एल्यूमीनियम और ऑटो जैसे खास रणनीतिक सेक्टर पर 25% से 50% तक का अलग और ज्यादा शुल्क लगता है।
इन बदलाव के बीच अब अमेरिका भारत पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा है। इस संबंध में अमेरिका में एक नया बिल लाया गया है, जो कानून बनने पर ट्रंप को रूस से ज्यादा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। इससे उन देशों पर नुकसान हो सकता है, जो रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करते हैं। इसमें चीन और भारत दोनों शामिल हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत को ट्रंप की धमकियों और 100% वाले टैरिफ बिल के बावजूद रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखना चाहिए या नहीं? आइए इसे डिकोड करने की कोशिश करते हैं।
अमेरिका का वो बिल जो देगा 100% टैरिफ लगाने की छूट
अमेरिका में जो नया बिल पेश हुआ है उसका नाम- 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगा सकेंगे, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं।
अमेरिकी के इस नए बिल के मुताबिक हर 180 दिन में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) रूस से सबसे ज्यादा ऊर्जा खरीदने वाले पांच देशों की समीक्षा करेगा। इसके बाद राष्ट्रपति तय करेंगे कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाए और किन्हें छूट मिले।
खबरें और भी
रूस से भारत समेत ये देश खरीदते हैं सबसे ज्यादा तेल
रूस से सबसे ज्यादा ऊर्जा खरीदने वाले देशों में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान है। हालांकि, अगर कोई देश अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का 15% से कम हिस्सा रूस से खरीदता है और रूस पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है, तो उसे टैरिफ से छूट मिल सकती है।
क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा?
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया था। इसके बाद रूस ने भारत को रियायती कीमतों पर तेल बेचना शुरू किया। आज स्थिति यह है कि भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 50-55% तक पहुंच चुकी है। जुलाई में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनरी उद्योग के लिए बेहद अहम बन चुका है। इसकी संभावना फिलहाल बहुत कम है कि भारत, रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा।
Kpler के विशेषज्ञ सुमित रितोलिया के अनुसार, रूसी तेल भारत के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प बना हुआ है। जब तक शिपिंग, बीमा या भुगतान व्यवस्था पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगते, तब तक भारतीय कंपनियां रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद नहीं करेंगी।
वहीं ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि सिर्फ टैरिफ लगने से भारत अपनी खरीद नहीं रोकेगा। भारत पहले भी ईरान, वेनेजुएला और रूस से प्रतिबंधित तेल नहीं खरीदता था, लेकिन केवल टैरिफ की वजह से खरीद बंद करने की संभावना कम है।
अगर रूस से तेल कम खरीदा गया तो क्या होगा?
अगर भारत रूसी तेल खरीद कम करता है, तो उसे हर दिन लगभग 8 लाख से 10 लाख बैरल अतिरिक्त तेल दूसरे देशों से खरीदना पड़ेगा। इससे तेल आयात महंगा होगा। रिफाइनरियों का खर्च बढ़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। और सरकार का आयात बिल बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत सिर्फ 1 डॉलर प्रति बैरल भी बढ़ती है, तो भारत का सालाना आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
अगर रूस से तेल खरीदना मुश्किल होता है, तो भारत इराक, सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका, ब्राजील, गुयाना, पश्चिम अफ्रीका और वेनेजुएला जैसे देशों से खरीद बढ़ा सकता है। हालांकि, इन देशों से तेल लाने में दूरी ज्यादा होने के कारण परिवहन, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी। ऐसे में रूस का विकल्प पूरी तरह तैयार नहीं माना जा रहा है।
यह बिल अभी अमेरिकी संसद में विचाराधीन है। इसे दोनों दलों के कुछ नेताओं का समर्थन मिला है, लेकिन कई सांसद इसका विरोध भी कर रहे हैं।
विरोध की सबसे बड़ी वजह यह है कि इससे अमेरिकी राष्ट्रपति को किसी भी देश पर भारी टैरिफ लगाने की व्यापक शक्ति मिल जाएगी। फिलहाल अमेरिकी संसद का निचला सदन (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) अवकाश पर है और यह साफ नहीं है कि बिल इस साल पास हो पाएगा या नहीं।
भारत पर 100% टैरिफ लगने की कितनी संभावना?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका का यह बिल कानून बन भी जाता है, तब भी भारत पर टैरिफ लगाना पूरी तरह ट्रंप प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा। अमेरिका को यह भी देखना होगा कि कहीं रूस पर ज्यादा सख्ती करने से वैश्विक तेल कीमतें और महंगाई न बढ़ जाए।
यही वजह है कि फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि भारत पर दोबारा टैरिफ लगाया जाएगा या नहीं। लेकिन इतना तय है कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो अमेरिका के पास ऐसा करने का कानूनी अधिकार जरूर होगा।