डॉलर को पछाड़ना चीनी युआन के बस की बात क्यों नहीं? एक्सपर्ट ने Euro का उदाहरण देकर समझाया
विशेषज्ञ डैनियल ग्रोस ने बताया कि चीनी युआन अमेरिकी डॉलर की जगह क्यों नहीं ले सकता। उन्होंने खुले वित्तीय बाजारों, पूंजी नियंत्रण और स्थिर नीतियों की ...और पढ़ें

डॉलर को पछाड़ना चीनी युआन के बस की बात क्यों नहीं?
HighLights
युआन को गहरे, तरल वित्तीय बाजारों की आवश्यकता है।
चीन में कड़े पूंजी नियंत्रण, वैश्विक स्वीकृति में बाधा।
निवेशक विश्वास के लिए नीति स्थिरता और कानून का शासन।
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से चीन की करेंसी युआन की चर्चा है। वैश्विक स्तर पर ऐसा कहा जा रहा है कि शायद चीन की करेंसी आने वाले समय में युआन ग्लोबल करेंसी (Global Currency) बने या फिर डॉलर की जगह लें। लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है। या यूं कहें कि चीन का युआन डॉलर की जगह नहीं ले (Is Chines Yuvan Can Replace US Dollar) सकता।
वैसे ब्रिक्स देश डॉलर की जगह ब्रिक्स करेंसी *BRICS Currency) लाने पर विचार कर रहे है। इस दिशा में ब्रिक्स देशों का समूह साथ मिलकर काम भी कर रहा है। लेकिन युआन आखिर डॉलर की जगह क्यों नहीं ले सकता है। इसे लकेर बोकोनी विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन पॉलिसीमेकिंग के निदेशक और IMF जैसे संस्थानों में काम कर चुके डैनियल ग्रोस ने साउथ चाइना पोस्ट को दिए इंटरव्यू दिए। इस इंटरव्यू में उन्होंने कई प्रश्नों के जवाब दिए।
साउथ चाइना पोस्ट में यह लेख What China can learn from the euro as it works towards a global yuan" के नाम से प्रकाशित हुआ है। उन्होंने प्रश्नों के जवाब शानदार तर्क दिए कि आखिर चीनी करेंसी क्यों डॉलर की जगह नहीं ले सकती? उन्होंने इस लेख के जरिए चीन को यह सलाह देनी चाहिए कि यूरो कै वैश्विक स्तर पर अपनाने में जिन परेशानियों का सामना करना पड़ा, अगर चीन उनसे सीखता है तो बात बन सकती है।
सिर्फ बड़ा निर्यातक ही नहीं वित्तीय बाजार पर भी देना होगा ध्यान
आज के समय में चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और व्यापारिक देश है। लेकिन डैनियल ग्रोस का तर्क है कि किसी मुद्रा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए केवल मजबूत अंतरराष्ट्रीय व्यापार होना ही काफी नहीं है। यूरो की सफलता के पीछे यूरोप का गहरा, तरल (liquid) और खुला वित्तीय बाजार था।
खबरें और भी
उन्होंने आगे कहा कि जब हर कोई डॉलर को चुन चुका है, तो वे इसे क्यों बदलेंगे? मुझे लगता है कि डॉलर में यही 'लॉक-इन इफेक्ट' है, और इसमें सेंध लगाना बहुत मुश्किल है।
दूसरी बात, जो मेरे पहले पॉइंट से जुड़ी है, वह यह है कि एक अंतरराष्ट्रीय करेंसी बनने के लिए, किसी भी करेंसी को बहुत गहरे और लिक्विड फाइनेंशियल मार्केट (Liquid Financial Market) की जरूरत होती है। यूरो के पास यह नहीं है, क्योंकि यूरोप का सिस्टम ज्यादा बैंक-केंद्रित है। चीन का सिस्टम भी बैंक-केंद्रित है।
डैनियल ग्रोस ने आगे कहा किइसके अलावा, अगर आप चाहते हैं कि आपकी करेंसी इंटरनेशनल (International Currency) बन जाए, तो आपके पास एक 'ओपन कैपिटल अकाउंट' होना जरूरी है। इसका मतलब है कि आप अपनी करेंसी की कीमत पर अपना कंट्रोल खो देते हैं। यही वह 'ट्रेड-ऑफ' है। एक ग्लोबल करेंसी होने के लिए यह जरूरी है कि उसकी कीमत दुनिया भर में तय हो।
कैपिटल कंट्रोल एक बड़ी समस्या
डैनियल ग्रोस ने आगे कहा कि यूरो को इसलिए वैश्विक स्तर पर तेजी से अपनाया गया क्योंकि यूरोजोन में पूंजी के आवागमन पर कोई प्रतिबंध नहीं था। इसके विपरीत, चीन में अभी भी कड़े कैपिटल कंट्रोल्स (Capital Control) लागू हैं। जब तक विदेशी निवेशकों को युआन में स्वतंत्र रूप से पैसा लगाने और निकालने की आजादी नहीं होगी, तब तक युआन के लिए अमेरिकी डॉलर को चुनौती देना मुश्किल है।
डैनियल ग्रोस ने कहा किहमें जो नहीं पता, वह यह है कि अगले 20 सालों में US कैसे बदलेगा। हमें लगता था कि हम जानते हैं कि यह एक स्थिर लोकतांत्रिक देश है। अब कुछ सवाल उठ रहे हैं। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य के चुनाव कैसे होते हैं। तो हाँ, मुझे लगता है कि यूरो में कुछ संभावना है, लेकिन मुझे यह सीमित लगती है।
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और बड़े निवेशक डॉलर को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि अमेरिकी ट्रेजरी (बॉन्ड्स) सबसे सुरक्षित और आसानी से बेचे जा सकने वाले माने जाते हैं। यूरो ने भी मजबूत बॉन्ड मार्केट के जरिए अपनी साख बनाई। चीन को भी अपने घरेलू बॉन्ड बाजार को विदेशियों के लिए अधिक खुला, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना होगा।
पारदर्शिता और स्थिरता लानी होगी
डैनियल ग्रोस ने कहा कि विदेशी निवेशक अपनी संपत्ति को ऐसे देश की मुद्रा में रखना पसंद करते हैं जहां नीतियां स्थिर हों और कानून का शासन (Rule of law) मजबूत हो। ग्रोस के अनुसार, निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए चीन को अपनी नियामक (Regulatory) नीतियों में ज्यादा पारदर्शिता और स्थिरता लानी होगी।
अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देगा यूरो?
यूरो से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देगा, लेकिन इसमें प्रगति धीमी रही है। डी-डॉलराइजेशन के संदर्भ में आज यूरो में कितनी क्षमता है? क्या यह एक भरोसेमंद मुद्रा बन सकती है, खासकर चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए?
इस सवाल के जवाब में डैनियल ग्रोस ने कहा कि बहुत ही सीमित हद तक। फिलहाल, डॉलर और यूरो के बीच का अनुपात लगभग 3:1 है। अगर यह 2.5:1 हो जाता है, तो इससे दुनिया में कोई खास बदलाव नहीं आएगा।
डैनियल ग्रोस ने इस प्रश्न के जवाब में कहा कि अखबार की ओर से सवाल किया गया गया कि US राष्ट्रपति के तौर पर डोनल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में, क्या आपको लगता है कि बढ़ते संरक्षणवाद ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नया रूप दिया है? अगर ऐसा है, तो क्या इससे EU और चीन के बीच ज्यादा करीबी आर्थिक और वित्तीय सहयोग के अवसर खुलते हैं, और इसमें सफलता कहां मिल सकती है?
मुझे नहीं लगता कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को ट्रम्प ने नया रूप दिया है। मुझे लगता है कि US वैश्विक व्यापार व्यवस्था से बाहर निकल गया है, जबकि बाकी देश इसका पालन कर रहे हैं। सभी एकेडमिक शोध इस बात से सहमत हैं कि ट्रम्प के टैरिफ की 90 प्रतिशत लागत US पर ही पड़ती है, तो उन्हें एक कोने में रहने दें और बाकी दुनिया अपना काम करती रहे।
चीन के हाथ से निकला बाजार
डैनियल ग्रोस ने कहा कि बेशक, चीन को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है, और चीनी लोग इससे काफी नाराज हैं। चीनियों से मैं यह कहूंगा: "वह बाजार तो हाथ से निकल गया, लेकिन हमें यह पक्का करना चाहिए कि हम बाकी सभी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखें और दूसरे बाजारों को खुला रखें। लेकिन अगर राजनेता यह आभास देते हैं कि वे कुछ खास बाजारों को निशाना बना रहे हैं, तो इससे और ज्यादा टकराव पैदा होता है।"
नोट- मूल लेख साउथ चाइना पोस्ट पर प्रकाशित हुआ था। Source- South China Post