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    बासमती चावल को लेकर भारत में फंसा पेंच, पाकिस्तान को हो सकता है बड़ा फायदा?

    Updated: Tue, 16 Jun 2026 06:10 PM (IST)

    चावल एक्सपोर्टर्स ने APEDA द्वारा GI मामलों के लिए नियुक्त लॉ फर्म पर मनमानी और हितों के टकराव का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह विवाद भारत के बासम ...और पढ़ें

    APEDA के GI और IPR मामलों को संभालने के लिए बनी लॉ फर्म से असंतुष्ट एक्सपोर्टर्स

    APEDA के GI और IPR मामलों को संभालने के लिए बनी लॉ फर्म से असंतुष्ट एक्सपोर्टर्स

    HighLights

    1. एक्सपोर्टर्स ने APEDA की लॉ फर्म नियुक्ति पर सवाल उठाए।

    2. फर्म पर हितों के टकराव और मनमानी का आरोप लगाया।

    3. बासमती GI मामले में भारत की स्थिति कमजोर होने का डर।

    नई दिल्ली| चावल एक्सपोर्टर्स (Rice Exporters) के दो संगठनों ने APEDA के GI और IPR मामलों को संभालने के लिए बनी एक लॉ फर्म से असंतुष्टि जताई है और वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिखा है। एक्सपोर्टर्स कमेटी का आरोप है कि लॉ फर्म की नियुक्ति "मनमाने तरीके" से की गई है। हालांकि, APEDA के सूत्रों का कहना है कि विशेषज्ञ चयन समिति द्वारा विधिवत टेंडर प्रक्रिया अपनाने के बाद ही इस लॉ फर्म को नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही एक्सपोर्टर्स ने लॉ फर्म के काम से भारत का GI Tag वाला मामला में कमजोर पड़ने की बात कही है। आइए पूरा मामला समझते हैं।

    बिना किसी सलाह के बना लॉ फर्म

    लॉ फर्म की नियुक्त को लेकर विवाद खड़ा करते हुए ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) और द बासमती राइस मिलर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (पंजाब) (BRMEA) ने अलग-अलग पत्र लिखकर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और APEDA के चेयरमैन अभिषेक देव को बताया कि एक्सपोर्टर्स और अन्य शेयरहोल्डर्स से सलाह किए बिना इस लॉ फर्म का चयन किया गया। संगठनों ने स्पष्ट किया कि वे लॉ फर्म की पेशेवर क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं और न ही उनके खिलाफ हैं। लेकिन उनकी मुख्य चिंता हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर है।

    मध्य प्रदेश के बासमती को लेकर फंसा पेंच

    Businessline के मुताबिक AIREA के अध्यक्ष सतीश गोयल ने कहा, कि हमारी चिंता संस्थागत प्रशासन, शेयरहोल्डर्स के विश्वास और बासमती GI की सुरक्षा से जुड़े BEDF के नियमों के पालन को लेकर है। BRMEA के अध्यक्ष बलकृष्ण गर्ग ने कहा कि हाल के वर्षों में सबसे विवादित मुद्दों में से एक मध्य प्रदेश को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने की मांग रही है।
    BRMEA के अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि APEDA द्वारा चुनी गई लॉ फर्म ने पहले उन याचिकाकर्ताओं (Petitioners) का प्रतिनिधित्व किया था जो मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने की मांग कर रहे थे। जबकि APEDA मध्य प्रदेश के क्षेत्रों को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने का विरोध करता रहा है।

    लॉ फर्म के फैसले को बताया मनमानी

    AIREA के अध्यक्ष सतीश गोयल ने कहा कि कुछ हितधारकों ने लॉ फर्म द्वारा पहले अपनाए गए रुख को लेकर चिंता जताई है। यह रुख बासमती GI के भौगोलिक दायरे से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा, कि हम इन मुद्दों पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, लेकिन अंतिम नियुक्ति से पहले इन चिंताओं पर विचार किया जाना चाहिए।" GI की परिभाषा के अनुसार, बासमती चावल का उत्पादन इंडो-गंगेटिक मैदान (Indo-Gangetic Plains) में होता है लेकिन APEDA द्वारा चुनी गई लॉ फर्म ने इस आधार को चुनौती देते हुए इसे मनमाना बताया था।

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    लॉ फर्म ने क्या कहा?

    लॉ फर्म का तर्क था कि GI निर्धारण में ऐतिहासिक पहचान और प्रतिष्ठा की बजाय कृषि-जलवायु (Agro-Climatic) कारकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, सार्वजनिक धारणा (Public Perception) का GI कानून में कोई स्वतंत्र महत्व नहीं है। BRMEA के गर्ग ने कहा कि ये तर्क APEDA और भारत सरकार द्वारा लगातार अपनाए गए आधिकारिक रुख के विपरीत है।

    पाकिस्तान और यूरोपीय संघ का संदर्भ

    मध्य प्रदेश से जुड़े याचिकाकर्ताओं, उनके वकीलों और पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ (EU) में भारत के बासमती GI आवेदन का विरोध किया है। दूसरी ओर, APEDA ने पाकिस्तान के आवेदन का विरोध किया है। गर्ग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर APEDA का पूरा तर्क इस आधार पर टिका है कि बासमती की उत्पत्ति निर्धारित इंडो-गंगेटिक क्षेत्र में हुई है।

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    BEDF नियमों का हवाला

    सतीश गोयल ने BEDF के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नियम 19.2.21 के तहत बोर्ड को सलाहकारों और कंसल्टेंट्स की नियुक्ति और भुगतान करने का अधिकार दिया गया है। चूंकि प्रस्तावित लॉ फर्म BEDF की रणनीतिक सलाहकार होगी, इसलिए इसके चयन में BEDF बोर्ड की भागीदारी होनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि नियम 19.1 के अनुसार संस्था के प्रबंधन और प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी बोर्ड पर है और उसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए सभी अधिकार बोर्ड पास है।

    पाकिस्तान को मिल सकता है फायदा

    BRMEA अध्यक्ष बलकृष्ण गर्ग ने कहा कि APEDA द्वारा प्रस्तावित यह जिम्मेदारी सामान्य मुकदमेबाजी (Litigation) से कहीं अधिक बड़ी है, और इसके लिए भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति के साथ पूर्ण तालमेल जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह संदेश जाता है कि भारत स्वयं बासमती की भौगोलिक सीमाओं, ऐतिहासिक प्रतिष्ठा और कानूनी आधारों को लेकर अलग-अलग, तो विरोधी पक्ष खासतौर पर पाकिस्तान इसका फायदा उठा सकता है। उनके अनुसार इससे बासमती GI से जुड़े वर्तमान और भविष्य के अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।