ENG vs IND: वैभव सूर्यवंशी ने डेब्यू पर दिखाई अपनी झलक, मैनचेस्टर में बड़ी पारी खेलने से चूके
वैभव सूर्यवंशी ने इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे टी20 मैच में डेब्यू किया। पदार्पण पर वे बड़ी पारी नहीं खेल सके लेकिन 15 वर्षीय बल्लेबाज ने अपनी झलक जरूर दिख ...और पढ़ें

वैभव सूर्यवंशी

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संदीपन बनर्जी, जागरण मैनचेस्टर। जब से भारतीय टीम सफेद गेंद के दौरे के लिए यूनाइटेड किंगडम पहुंची, तब से टीम जहां भी गई, एक ही नाम चर्चा में रहा और वह है वैभव सूर्यवंशी। बेलफास्ट हो या डरहम या मैनचेस्टर। शुरुआत में एक भी मैच न खेलने के बावजूद यह युवा खिलाड़ी आकर्षण का केंद्र बना रहा।
हर ट्रेनिंग सेशन में मैदान पर एक ही सवाल गूंजता था, वैभव भारत के लिए अपना पदार्पण कब करेंगे? बेलफास्ट में शुरुआती दौर के बाद इंतजार और लंबा हो गया। नेट्स में घंटों पसीना बहाने के बावजूद, सूर्यवंशी को आयरलैंड के विरुद्ध दोनों टी-20 मैचों से बाहर रखा गया।
इंग्लैंड के खिलाफ पहले मैच में नहीं मिला मौका
इंग्लैंड के विरुद्ध पहले टी-20 से पहले डरहम में भी कहानी वही रही। उन्होंने जमकर ट्रेनिंग की, कैमरों और उत्सुक दर्शकों का ध्यान खींचा, लेकिन एक बार फिर उन्हें अंतिम एकादश से बाहर ही रहना पड़ा। पूरे दौरे पर भारतीय खेमे का संदेश एक जैसा ही रहा। मैनचेस्टर मैच से पहले हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में टीम प्रबंधन का यही कहना था कि सूर्यवंशी को पदार्पण का मौका किसी ऐसे स्थापित खिलाड़ी की जगह नहीं दिया जाना चाहिए जो सही मौके का हकदार हो। फिर भी संजू सैमसन के ओपनर के तौर पर लगातार तीन निराशाजनक प्रदर्शनों के बाद इस युवा खिलाड़ी को टीम में शामिल करने की मांग बढ़ती गई।
इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे मुकाबले में वैभव का डेब्यू
मैनचेस्टर में कुछ ऐसे संकेत मिले जिनसे पता चला कि कुछ बदल गया है। दूसरे टी-20 से एक दिन पहले भारत के ट्रेनिंग सेशन के दौरान सूर्यवंशी का रूटीन काफी अलग था। बेलफास्ट और डरहम में उन्होंने सेशन के पहले हिस्से में लंबे समय तक बल्लेबाजी की थी तो मैनचेस्टर में उन्होंने आखिर तक इंतजार किया और मुश्किल से 15 मिनट तक ही गेंदें खेलीं। पहली नजर में तो ऐसा लगा मानो एक और मौका हाथ से निकल गया हो लेकिन एक और पैटर्न था जिस पर ध्यान गया।
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इस साल की शुरुआत में जिम्बाब्वे में अंडर-19 विश्व कप को कवर करते समय मैंने देखा था कि सूर्यवंशी अक्सर उन मैचों से एक दिन पहले अपने अभ्यास को जानबूझकर हल्का रखते थे, जिनमें उन्हें खेलना होता था। उस याद ने मैनचेस्टर में हुए छोटे से नेट सेशन को निराशा की वजह से बदलकर आने वाले समय के संभावित संकेत में बदल दिया। शुक्रवार की रात को उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपनी फोटो के साथ स्टोरी लगाई जिसमें लिखा था न्यू चैप्टर। सबसे मजबूत संकेत मैच वाले दिन मिला।
तिलक वर्मा ने सौंपी वैभव सूर्यवंशी को कैप
ओल्ड ट्रैफर्ड पहुंचने के कुछ ही देर बाद, सूर्यवंशी हाथ में बल्ला लेकर ड्रेसिंग रूम से बाहर निकले और सीधे सेंटर विकेट पर शैडो प्रैक्टिस करने चले गए। उनके हाव-भाव से लग रहा था कि कोई खिलाड़ी अपने खास पल के लिए तैयारी कर रहा है। जल्द ही विरोधी टीम के खिलाड़ियों ने उन्हें बधाई दी। टॉस से पहले उपकप्तान तिलक वर्मा ने उन्हें भारत की अपनी पहली कैप सौंपी, जिससे वह भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे युवा क्रिकेटर बन गए।
इस खबर से प्रेस बॉक्स में मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ गई। इस पल का स्वागत सिर्फ भारतीय पत्रकारों ने ही नहीं किया, बल्कि इंग्लिश मीडिया के कई सदस्यों ने भी किया। पूरे दौरे के दौरान, ब्रिटिश पत्रकार सूर्यवंशी के खेल में हो रही प्रगति पर बारीकी से नजर रखे हुए थेख् कुछ लोगों ने तो इसे "सूर्यवंशी का समर" (समर ऑफ सूर्यवंशी) तक कह दिया था। उनका पदार्पण सिर्फ एक और रोमांचक युवा प्रतिभा के आने जैसा नहीं था। इसने भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दिया।
पूर्णकालिक सदस्य देशों के पदार्पण करने वाले खिलाड़ी-
हसन रजा (पाकिस्तान), 14 साल 227 दिन
हसन रजा गेंद को बहुत अच्छे से टाइम करते थे। अक्टूबर 1996 में 15 साल के होने से पहले ही उन्होंने जिम्बाब्वे के विरुद्ध मैच खेला और नंबर पांच पर बल्लेबाजी करते हुए 48 गेंदों में 27 रन बनाए। हालांकि बाद में उनकी उम्र को लेकर शक पैदा हुआ और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस दावे को वापस ले लिया कि रजा खेल के इतिहास में सबसे कम उम्र के पुरुष टेस्ट में पदार्पण करने वाले खिलाड़ी थे। चाहे वह 14 साल के हों या 15 साल के (जैसा कि कुछ लोगों का दावा था), उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिम्मत तो दिखाई, लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे। सदी बदलने से पहले उन्होंने सिर्फ एक और टेस्ट खेला फिर उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया।
मोहम्मद शरीफ (बांग्लादेश), 15 साल 116 दिन
मोहम्मद शरीफ ने नेशनल लीग में शानदार प्रदर्शन के दम पर 2001 में बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीम में जगह बनाई। उस समय वह देश के उन चुनिंदा गेंदबाज में से एक थे जो रिवर्स स्विंग करा सकते थे। जिम्बाब्वे के विरुद्ध वनडे में पदार्पण मैच में उन्होंने 10 ओवर के स्पेल में 31 रन देकर 1 विकेट लिया। हालांकि हरारे में जिंबाब्वे ने आसानी से सात विकेट से जीत हासिल की। शरीफ 2002 में टेस्ट और वनडे दोनों टीमों से बाहर हो गए। उनका छह साल का करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा, जिसमें उन्होंने सिर्फ 19 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले।
मुश्ताक मोहम्मद, पाकिस्तान, 15 वर्ष, 124 दिन
ऑलराउंडर मुश्ताक मोहम्मद उन पांच मशहूर मोहम्मद भाइयों में से एक थे जो भारत के बंटवारे के बाद कराची चले गए थे। मार्च 1959 में, 15 साल की उम्र में उन्होंने लाहौर में पहली बार पाकिस्तान के लिए खेला। लेग-ब्रेक, गुगली और फ्लिपर में माहिर मुश्ताक वेस्टइंडीज विरुद्ध छह ओवर के स्पेल में कोई विकेट नहीं ले पाए और फिर दोनों पारियों में कुल 18 रन बनाए। उन्होंने रिवर्स-स्वीप शॉट की शुरुआत की। उन्होंने 57 टेस्ट खेले और 19 मैचों में टीम की कप्तानी भी की।
आकिब जावेद (पाकिस्तान), 16 साल 127 दिन
तेज गेंदबाज आकिब जावेद ने दिसंबर 1988 में वेस्टइंडीज के खिलाफ सिर्फ 16 साल की उम्र में अपना वनडे पदार्पण किया, जिसमें डेसमंड हेंस ने शतक लगाया था। उस मैच में उन्होंने नौ ओवर में 49 रन देकर एक विकेट लिया। सालों तक उन्होंने रिवर्स स्विंग के माहिर खिलाड़ी के तौर पर अपनी पहचान बनाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1991 में भारत के विरुद्ध 37 रन देकर सात विकेट लेना था।
सचिन तेंदुलकर (भारत), 16 साल 205 दिन
क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध टेस्ट मैच में कराची में अपना पदार्पण किया था। तेंदुलकर ने सबसे उस समय कम उम्र में पदार्पण करने वाले भारतीय खिलाड़ी का रिकॉर्ड तोड़ा था। यह रिकार्ड पहले एल. शिवरामकृष्णन के नाम था, जिन्होंने 1983 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 17 साल की उम्र में खेला था। अगले 37 सालों तक भारत का यह रिकॉर्ड अपने नाम रखने वाले तेंदुलकर को मैदान पर उतरने के कुछ ही समय बाद वकार की एक बाउंसर गेंद चेहरे पर लगी थी।
उन्होंने तब तक बल्लेबाजी जारी रखी जब तक वकार ने उन्हें आउट नहीं कर दिया। उन्होंने 24 गेंदों में 15 रन बनाए थे। तेंदुलकर जल्द ही एक असाधारण प्रतिभा वाले किशोर से 1990 के निराशाजनक दौर में भारत की बड़ी उम्मीद बन गए और फिर एक सीनियर खिलाड़ी बने जिन्होंने 100 शतक लगाए और खेल के सबसे सफल रन-स्कोरर बने। अपने करियर के आखिर में भी, उनमें दर्शकों को अपनी ओर खींचने की वैसी ही काबिलियत थी जैसी किसी और में नहीं थी।