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    सिर्फ मोटापा नहीं, दुबलापन भी बना तनाव की वजह; युवाओं में बढ़ रहा बॉडी इमेज डिस्ट्रेस

    By ANOOP KUMAR SINGHEdited By: Anup Tiwari
    Updated: Mon, 05 Jan 2026 08:59 AM (IST)

    AIIMS और ICMR के एक संयुक्त अध्ययन से पता चला है कि युवाओं में 'बॉडी इमेज डिस्ट्रेस' एक गंभीर मानसिक चुनौती बन गई है। यह समस्या केवल मोटे युवाओं तक सी ...और पढ़ें

    बॉडी इमेज डिस्ट्रेस से गुजर रहे युवा। प्रतीकात्मक तस्वीर

    बॉडी इमेज डिस्ट्रेस से गुजर रहे युवा। प्रतीकात्मक तस्वीर

    HighLights

    1. AIIMS-ICMR अध्ययन ने युवाओं में बॉडी इमेज डिस्ट्रेस उजागर किया।

    2. मोटे और दुबले दोनों युवा मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।

    3. व्यक्तिगत देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की तत्काल आवश्यकता।

    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। देश के युवाओं के सामने मानसिक स्वास्थ्य की एक नई और खामोश चुनौती उभर कर सामने आई है। यह चुनौती न केवल मोटापे से जूझ रहे युवाओं तक सीमित है, बल्कि दुबले-पतले दिखने वाले युवा भी इसकी चपेट में हैं।

    अपने शरीर को लेकर लगातार तुलना, टिप्पणियां और सामाजिक अपेक्षाएं अब उनके आत्मविश्वास को अंदर से खोखला कर रही हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के संयुक्त अध्ययन ने इस छिपे हुए संकट को पहली बार ठोस आंकड़ों के साथ सामने रखा है।

    आधे युवा मानसिक दबाव में

    जर्नल आफ एजुकेशन एंड हेल्थ प्रमोशन में प्रकाशित इस अध्ययन में एम्स की ओपीडी से जुड़े 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के 1,071 युवाओं को शामिल किया गया। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि 49 प्रतिशत मोटापे से ग्रस्त और 47 प्रतिशत कम वजन वाले युवा मध्यम से गंभीर स्तर के बाडी इमेज डिस्ट्रेस से गुजर रहे हैं। इसके मुकाबले सामान्य या थोड़ा अधिक वजन वाले युवाओं में यह समस्या अपेक्षाकृत कम, करीब 36 प्रतिशत पाई गई।

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    भ्रम टूटा: समस्या सिर्फ मोटापे की नहीं

    अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता, न्यूट्रिशनिस्ट और पीएचडी स्कालर वारिशा अनवर कहती हैं कि यह शोध एक बड़ी सामाजिक गलतफहमी को तोड़ता है। उनके मुताबिक 'अब तक बाडी इमेज को मोटापे से जोड़कर देखा जाता रहा है, जबकि हमारे अध्ययन में कम वजन वाले युवाओं में भी उतनी ही गहरी बेचैनी, आत्म संदेह और शर्मिंदगी देखने को मिली। उन्होंने चिंता जताई कि कई युवा खुद को लगातार दूसरों की नजरों में आंकते हुए जी रहे हैं।'

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    वजन के साथ बदलती मानसिक पीड़ा

    अध्ययन बताता है कि मानसिक असर वजन के अनुसार अलग-अलग रूप ले लेता है। मोटापे से जूझ रहे युवाओं में आत्म-संकोच और आत्मविश्वास की कमी ज्यादा दिखती है, जबकि कम वजन वाले युवाओं में चिंता, अकेलापन और सामाजिक दूरी की भावना प्रबल होती है। कुल मिलाकर आधे से अधिक युवा अपने वजन को लेकर लगातार सचेत रहते हैं, हर तीसरा युवा खुद को कम आत्मविश्वासी मानता है और हर चौथा युवा यह महसूस करता है कि उसे उसके शरीर के आधार पर जज किया जा रहा है।

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    ‘वजन प्रबंधन तराजू तक सीमित नहीं’

    एम्स के मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डा. पियूष रंजन मानते हैं कि यहीं पर व्यवस्था चूक जाती है। उनके शब्दों में 'वजन प्रबंधन को हमने सिर्फ कैलोरी और किलो तक सीमित कर दिया है, जबकि यह मानसिक स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा विषय है। जब भावनात्मक तनाव को नजरअंदाज किया जाता है, तो युवा बीच में ही जीवनशैली सुधार कार्यक्रम छोड़ देते हैं।'

    नीति की खामी, चेतावनी साफ

    एम्स के मेटाबोलिक रिसर्च ग्रुप के प्रमुख प्रोफेसर नवल के. विक्रम इस स्थिति को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए चेतावनी मानते हैं। उनके अनुसार भारत की स्वास्थ्य रणनीति मोटापे पर तो केंद्रित है, लेकिन कम वजन वाले युवाओं के मानसिक बोझ को लगभग नजरअंदाज कर देती है। जबकि जरूरत है व्यक्ति केंद्रित देखभाल की, जहां शुरुआती मनोवैज्ञानिक जांच, पोषण सेवाओं के साथ मानसिक स्वास्थ्य समर्थन और बाडी इमेज को लेकर संवेदनशील काउंसलिंग को खासकर शैक्षणिक संस्थानों में अनिवार्य किया जाए।'

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    इस समाचार में उपयोग किए गए क्रिएटिव ग्राफिक्स को NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया है।