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    एअर इंडिया फ्लाइट टर्बुलेंस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच शुरू, एयरबस और बीईए की टीम आएगी दिल्ली

    Updated: Tue, 11 Aug 2026 04:49 PM (GMT+05:30)

    फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की उड़ान में 300 फीट की अचानक गिरावट के बाद अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां जांच में सक्रिय हो गई हैं। भारतीय एएआइबी के साथ ए ...और पढ़ें

    घटना के दौरान विमान के भीतरी हिस्से की क्षतिग्रस्त सीलिंग। सौ- इंटरनेट मीडिया

    घटना के दौरान विमान के भीतरी हिस्से की क्षतिग्रस्त सीलिंग। सौ- इंटरनेट मीडिया

    HighLights

    1. फुकेट-दिल्ली एअर इंडिया उड़ान में 300 फीट की अचानक गिरावट।

    2. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां, एयरबस और बीईए जांच में शामिल।

    3. हाइड्रोलिक सिस्टम में नौ फाल्ट मैसेज, डेटा विश्लेषण जारी।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की उड़ान का अचानक 300 फीट तेज झटके के साथ नीचे गिरना और संदिग्ध तकनीकी खराबी के मामले में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां पूरी तरह सक्रिय हो गई हैं।

    भारतीय विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआइबी) के नेतृत्व में चल रही इस बहुस्तरीय जांच में विदेशी विशेषज्ञों और विमान निर्माता कंपनी की टीमें शामिल की जा रही हैं। बुधवार को एयरबस व बीईए की विशेष टीम के नई दिल्ली पहुंचने की उम्मीद है।

    बता दें कि फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (एफडीआर) और कॉकपिट वायस रिकॉर्डर (सीवीआर) के जटिल आंकड़ों को डिकोड करने तथा एयरोस्पेस साफ्टवेयर ग्लिच की गुत्थी सुलझाने में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की तकनीकी भूमिका बेहद अहम होती है। उड़ान के दौरान एयरबस ए320 नियो के तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम में एक मिनट के भीतर संयुक्त रूप से नौ फाल्ट मैसेज दर्ज हुए थे।

    इस असाधारण तकनीकी स्थिति का विश्लेषण फ्रांस की प्रतिष्ठित जांच एजेंसी ब्यूरो ऑफ इंक्वायरी एंड एनालिसिस (बीईए) कर रही है। इसके साथ ही विमान निर्माता कंपनी एयरबस की एक विशेष तकनीकी टीम बुधवार तक भारत पहुंचेगी, जो विमान के ऑन-बोर्ड डेटा और भौतिक प्रणालियों की गहन जांच करेगी।

    पूर्व में भी भारतीय एयरस्पेस में या भारतीय एयरलाइंस से जुड़े बड़े हादसों व तकनीकी गड़बड़ियों की जांच में एएआइबी विदेशी सुरक्षा एजेंसियों और संबंधित देशों के विमानन बोर्ड की मदद लेता रहा है।

    अपनाई जा रही 360-डिग्री दृष्टि

    360-डिग्री दृष्टिकोण के तहत नियामक और सुरक्षा संबंधी कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। मानक एसओपी के तहत घटना के बाद उड़ान क्रू को अनिवार्य डोप और अल्कोहल टेस्ट से गुजारा गया था। प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए पायलटों का दोबारा डोप टेस्ट कराया गया, जिसकी जांच रिपोर्ट को अंतिम रूप से आधिकारिक रिकार्ड में शामिल किया जा रहा है।

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    दूसरी ओर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने ए320 नियो विमानों के हाइड्रोलिक और फ्लाइट कंट्रोल प्रणालियों के विशेष सुरक्षा निरीक्षण के आदेश दिए हैं।

    एएआइबी की जांच टीम यात्रियों द्वारा रिकार्ड किए गए वीडियो, केबिन क्रू के बयानों और रडार डेटा को ब्लैक बाक्स के टाइम-सिंक के साथ मिलाकर देख रही है, ताकि यह सटीक रूप से पता लगाया जा सके कि टर्बुलेंस पहले आया था या हाइड्रोलिक फाल्ट मैसेज, और इस स्थिति का विमान के सिस्टम पर क्या प्रभाव पड़ा।

    भारतीय विमान हादसों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रमुख मामले और नतीजे

    विमान दुर्घटनाओं की जांच में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सहयोग का एक लंबा इतिहास रहा है। एअर इंडिया एक्सप्रेस (कोझिकोड हादसा, 2020) के दौरान अमरीका की एनटीएसबी और बोइंग की सेफ्टी टीम की मदद ली गई थी, जिसके बाद टेबलटाप रनवे पर लैंडिंग सुरक्षा प्रोटोकाल सख्त किए गए और काकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट में बड़े बदलाव हुए।

    इसी तरह एयर इंडिया एक्सप्रेस (मंगलुरु हादसा, 2010) की जांच में एनटीएसबी और एफएए के सहयोग से रनवे एंड सेफ्टी एरिया का विस्तार करने और पायलटों के थकान प्रबंधन के कड़े नियम लागू करने के नतीजे सामने आए। चरखी दादरी मिड-एयर कोलिजन (1996) में आइसीएओ और एनटीएसबी की मदद से भारत में 'कंपलसरी टीसीएएस' (ट्रैफिक कोलिजन अवाइडेंस सिस्टम) और सेकेंडरी सर्विलांस रडार लगाना अनिवार्य किया गया था।

    विमान दुर्घटना जांच में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का इतिहास

    विमान दुर्घटनाओं की जांच में वैश्विक सहयोग की नींव 7 दिसंबर 1944 को हुए 'शिकागो सम्मेलन' के दौरान रखी गई थी। इसके बाद वर्ष 1951 में अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आइसीएओ) ने आधिकारिक तौर पर एनेक्स 13 - एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट एंड इंसिडेंट इन्वेस्टिगेशन लागू किया।

    इसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि दुर्घटना वाले देश की प्राथमिक जांच के अलावा स्टेट ऑफ मैन्युफैक्चर (जैसे एयरबस के लिए फ्रांस की बीईए और बोइंग के लिए अमेरिका की एनटीएसबी) और स्टेट आफ डिजाइन को जांच में शामिल होने का कानूनी व तकनीकी अधिकार होगा।

    इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसी पर दोष मढ़ना नहीं, बल्कि दुर्घटना के सटीक कारणों को समझकर भविष्य के लिए वैश्विक उड्डयन सुरक्षा मानकों को मजबूत बनाना है।

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